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Question
रोमन साम्राज्य के वास्तुकलात्मक रूपों से इस्लामी वास्तुकलात्मक रूप कैसे भिन्न थे?
Solution
रोमन साम्राज्य की वास्तुकला की विशेषताएँ-रोमन साम्राज्य की वास्तुकला अत्यधिक कुशलतापूर्ण थी। रोमन साम्राज्य
के भवन निर्माण या वास्तुकला के प्रारूप रोमन शासकों के महान क़लात्मक प्रेम को प्रदर्शित करती हैं। उनकी वास्तुकला की निम्न विशेषताएँ देखने को मिलती हैं-रोमन वास्तु कलाकारों द्वारा ही सर्वप्रथम कंक्रीट का प्रयोग किया गया था। उन कलाकारों ने दुनिया को ईंट व पत्थर के टुकड़ों को मजबूती से जोड़ने की कला का ज्ञान कराया गया। रोमन कलाकारों ने वास्तुकला निर्माण के क्षेत्र में दो नए प्रयोग किए-(i) डाट का प्रयोग और (ii) गुम्बदों का आविष्कार।
रोमन वास्तुकला में निपुण कलाकार डाट की सहायता से दो-तीन मंजिला इमारतें बनाते चले गए। डाटों का इस्तेमाल पुल, द्वार और विजय स्मारकों के निर्माण में अधिक किया गया था।
- उदाहरण के लिए
- रोम के फोरम जूलियस की दुकानें। पुराने रोमन फोरम के विस्तार के लिए 51 ई० के बाद स्तंभों वाले इस चौक (पिआजा) को बनाया गया।
- चित्र नाइम्स के पास पान दु गार्ड फ्रांस, प्रथम शताब्दी ई० के रोम इंजीनियरों ने तीन महाद्वीपों के पार पानी ले जाने के लिए विशाल जलसेतुओं (Aqueducts) का निर्माण किया।
- पोम्पई – एक मदिरा व्यापारी का भोजन कक्ष। कमरे की दीवारों पर मिथक पशु बनाए गए हैं। 79 ई० में बना कोलोसिथम जहाँ तलवारिये (तलवार चलाने के निपुण योद्धा) जंगली जानवरों का मुकाबला करते थे। यहाँ एक साथ 60,000 दर्शक बैठ सकते थे।
रोमन कलाकारों द्वारा बनाए गए कोलोसियम और पेथियन नामक भवन वास्तुकला के उत्कृष्ट प्रारूप हैं। कोलोसियम एक प्रकार का गोलाकार थियेटर की आकृति का था जहाँ रोमवासी पशुओं व जंगली तथा दासों के मध्य होने वाली लड़ाइयों को बैठकर देखते थे। थियन एक गोल गुम्बद है। इसकी ऊँचाई व चौड़ाई लगभग 142 फीट है और इसका निर्माण रोम सम्राट हैड्रियन द्वारा कराया गया था।
रोमन वास्तुकला के लोग इंजीनियरी कला से भी आगे निकल चुके थे। उनके द्वारा बनाए गए पुल व सड़कें आज भी विद्यमान हैं। - इस्लामी वास्तुकला की विशेषताएँ – अरब या मुस्लिम वास्तुकला निर्माताओं ने मेहराब, गुम्बद का निर्माण करना रोमन लोगों से सीखा। उन्होंने उनकी नकल पर अनेक उत्कृष्ट मस्जिदों या इबादतगाहों तथा मकबरों व मेहराबों या मदरसों का निर्माण किया। इस्लामी वास्तुकला की विशेषताएँ इस प्रकार हैं
दसवीं शताब्दी की अवधि तक इस्लामी जगत् का ऐसा स्वरूप उभरा जिसे पहचानना आसान था। इस्लामी साम्राज्यों में अनेक धार्मिक इमारतें, इस्लामी जगत की पहचान बनीं। मध्य एशिया से लेकर स्पेन तक जितनी भी मस्जिदें, मदरसे व मकबरे बने उन सभी का मूल प्रारूप एक जैसा था। उन्होंने वास्तुकला के निर्माण में नवीनता मीनारों और खुले सहन आदि के क्षेत्र में दिखलायी। ये सभी इमारतें मुस्लिम समुदाय की आध्यात्मिकता और व्यावहारिक आवश्यकताओं की जरूरतें थीं।
इस्लाम की पहली सदी में मस्जिद ने एक विशेष वास्तुशिल्पीय रूप (खंभों के सहारे वाली छत) प्राप्त कर लिया था। इसे हम प्रादेशिक भिन्नताओं से अलग कर सकते हैं। प्रत्येक मस्जिद में एक खुला प्रांगण (आँगन) होता था जहाँ एक फव्वारा अथवा जलाशय का निर्माण किया जाता था। यह प्रांगण एक बड़े कक्ष की ओर खुलता था जिसमें इबादत करने वालों की लम्बी पंक्तियों और नमाज के नेतृत्व करने वाले इमाम के लिए विस्तृत स्थान होता था। बड़े कक्षों की दो विशेषताएँ थीं
- दीवार में एक मेहराब होती थी जो मक्का (किबला) की ओर निर्देशित करती थी।
- एक मंच या मिम्बर जिसका प्रयोग शुक्रवार को दोपहर की नमाज के समय प्रवचन देने के लिए किया जाता था।
इमारत मुख्य रूप से मीनार से जुड़ी होती है। इस मीनार का प्रयोग नियत समयों पर प्रार्थना हेतु बुलाने के लिए किया जाता है। मीनार नए धर्म के अस्तित्व का प्रतीक था। शहरी और ग्रामीण स्थलों में समय का अनुमान पाँच दैनिक प्रार्थनाओं व साप्ताहिक प्रवचनों की मदद से लगाते थे।
अल-मुतव्वकिल की महान मस्जिद
यह है दूसरी अब्बासी राजधानी समारा की अल-मुतव्वकिल की महान मस्जिद। इसका निर्माण सन् 850 ई० में हुआ था। इसकी ऊँचाई 50 मीटर है। इसका निर्माण ईंटों द्वारा हुआ है तथा मेसोपोटामिया की वास्तुकला की परंपराओं के प्रति प्रेरित यह महान मस्जिद कई शताब्दियों तक संसार की सबसे बड़ी मस्जिद थी।
मुस्तनसिरिया मदरसे
यह है 1233 में स्थापित मुस्तनसिरिया मदरसे (महाविद्यालय) का आँगन। मदरसे मस्जिदों से जुड़े होते थे, लेकिन बड़े मदरसों की अपनी मस्जिदें होती थीं।
पथरीले टीले के ऊपर अल-मलिक चट्टान का गुंबद, इस्लामी वास्तुकला का पहला बड़ा नमूना है। जेरूसलम नगर की मुस्लिम के प्रतीक रूप में इस स्मारक का निर्माण किया गया।
केंद्रीय प्रांगणों के चारों ओर निर्मित इमारतों के निर्माण का प्रारूप न केवल मस्जिदों व मकबरों में बल्कि काफिलों की सरायों, अस्पतालों और महलों में भी पाया जाता था। उमय्यदों ने नखलिस्तानों में ‘मरुस्थली महलों का निर्माण कराया; जैसे–फिलिस्तीन में खिरबत अल-मफजर व जोर्डन में कुसाईर अमरा। ये सभी शानदार व विलासपूर्ण निवास स्थानों और शिकार तथा मनोरंजन के लिए विश्राम-स्थलों के रूप में काम में आते थे।
इस फर्श को चित्रों, प्रतिमाओं एवं पच्चीकारी की सुंदर कला से सुसज्जित किया गया था। इनका निर्माण नि:संदेह रोमन व ससानी वास्तुशिल्प के प्रभावस्वरूप हुआ था।