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Question
सामाजिक व्यवस्था का क्या अर्थ है तथा इसे कैसे बनाए रखा जा सकता है?
Long Answer
Solution
- सामाजिक व्यवस्था सुस्थापित समाजिक प्रणालियाँ हैं, जो परिवर्तन को प्रतिरोध तथा उसे विनियमित करती हैं।
- सामाजिक व्यवस्था सामाजिक परिवर्तन को रोकती है, हतोत्साहित करती है अथवा कम से कम नियंत्रित करती है। अपने आपको एक शक्तिशाली तथा प्रासंगिक सामाजिक व्यवस्था के रूप में सुव्यवस्थित करने के लिए प्रत्येक समाज को अपने आपको समय के साथ पुनरूत्पादित करना तथा उसके स्थायित्व को बनाए रखना पड़ता है। स्थायित्व के लिए आवश्यक हैं कि चीजें कमोबेश वैसी ही बनी रहें जैसी वे हैं - अर्थात व्यक्ति लगातार समाज के नियमों का पालन करता रहे, सामाजिक क्रियाएँ एक ही प्रकार के परिणाम दें और साध रिणत: व्यक्ति तथा संस्थाएँ पूर्वानुमानित रूप में आचरण करें।
- समाज के शासक अथवा प्रभावशाली वर्ग अधिकांशतः सामाजिक परिवर्तन का प्रतिरोध करते हैं, जो उनकी स्थिति को बदल सकते हैं, क्योंकि स्थायित्व में उनका अपना हित होता है। वहीं दूसरी तरफ अधीनस्थ अथवा शोषित वर्गों का हित परिवर्तन में होता है। सामान्य स्थितियाँ अधिकांशतः अमीर तथा शक्तिशाली वर्गों की तर. फदारी करती हैं तथा वे परिवर्तन के प्रतिरोध में सफल होते हैं।
- सामाजिक व्यवस्था सामाजिक संबंधों की विशिष्ट पद्धति तथा मूल्यों एवं मानदंडों के सक्रिय अनुरक्षण तथा उत्पादन को निर्देशित करती है। विस्तृत रूप में, सामाजिक व्यवस्था इन दो में से किसी एक तरीके से प्राप्त की जा सकती है, जहाँ व्यक्ति नियमों तथा मानदंडों को स्वतः मानते हों अथवा कहाँ मानदंडों को मानने के लिए व्यक्तियों को बाध्य किया जाता हो।
- सामाजीकरण भिन्न परिस्थितियों में अधिक या न्यूनतः कुशल हो सकता है, परंतु वह कितना ही कुशल क्यों न हो, यह व्यक्ति की दृढ़ता को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं कर सकता है।
- समाजीकरण, समाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अथक प्रयास करता है, परंतु यह प्रयास भी अपने आप में पूर्ण नहीं होता।
- अतः अधिकतर आधुनिक सामज कुछ रूपों में संस्थागत तथा सामाजिक मानदंडों को बनाए रखने के लिए शक्ति अथवा दबाव पर निर्भर करते हैं।
- सत्ता की परिभाषा अधिकांशतः इस रूप में दी जाती है कि सत्ता स्वेच्छानुसार एक व्यक्ति से मनचाहे कार्य को करवाने की क्षमता रखती है। जब सत्ता का संबंध स्थायित्व तथा स्थिरता से होता है तथा दूसरे जुड़े पक्ष अपने सापेक्षिक स्थान के अभ्यस्त हो जाते हैं, तो हमारे सामने प्रभावशाली स्थिति उत्पन्न होती है।
- यदि सामाजिक तथ्य (व्यक्ति, संस्था अथवा वर्ग) नियमपूर्वक अथवा आदतन सत्ता की स्थिति में होते हैं, तो इसे प्रभावी माना जाता है।
- साधारण समय में, प्रभावशाली संस्थाएँ, समूह तथा व्यक्ति समाज में निर्णायक प्रभाव रखते हैं। ऐसा नहीं है कि उन्हें चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता, परंतु यह विपरीत तथा विशिष्ट परिस्थितियों में होता है।
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सामाजिक व्यवस्था
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