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Question
संस्कृति संवेगों की अभिव्यक्ति को कैसे प्रभावित करती है?
Solution
संवेगों को अभिव्यक्त करने में संस्कृति का विशेष योगदान है। संवेगों का अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि हमारे सामने वाला व्यक्ति या मित्र प्रसन है या दु:खी है ? क्या वह हमारी भावनाओं को समझ पाता है या नहीं ? संवेग एक आन्तरिक अनुभूति है जिसका दूसरे सीधे प्रेक्षण नहीं कर पाते या नहीं कर सकते। संवेगों का अनुमान केवल उनके वाचिक अथवा अवाचिक अभिव्यक्तियों के द्वारा ही होता है। ये वाचिक या अवाचिक अभिव्यक्तियों संचार माध्यम का कार्य करती हैं, इनके द्वारा व्यक्ति अपने संवेगों की अभिव्यक्ति करने तथा दूसरों की अनुभूतियों को समझने में समर्थ होता है।
संस्कृति एवं संवेगात्मक अभिव्यक्ति :
अध्ययनों से यह पता लगा है कि अधिकांश मूल संवेग सहज अथवा जन्मजात होते हैं और उन्हें सीखना नहीं पड़ता। अधिकांशतः मनोवैज्ञानिक यह विश्वास करते हैं संवेगों, विशेषकर चेहरे की अभिव्यक्तियों के प्रबल जैविक संबंध (बंधन) होते हैं। उदाहरण के लिए, वे बालक जो जन्म से दृष्टिहीन हैं तथा जिन्होंने दूसरों को मुस्कराते हुए या दूसरों का चेहरा भी नहीं देखा है, वे भी उसी प्रकार मुस्कराते हैं अथवा माथे पर बल डालते हैं जिस प्रकार सामान्य दृष्टी वाले बालक।
किंतु विभिन्न संस्कृतियों की तुलना करने पर यह ज्ञात होता है कि संवेगों में अधिगम की प्रमुख भूमिका होती है। यह दो प्रकार से होता है। प्रथम, सांस्कृतिक अधिगम संवेगों के अनुभव की अपेक्षा संवेगों की अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावित करता है, उदाहरण के लिए, कुछ संस्कृतियों में मुक्त सांवेगिक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है, जबकि कु हु सरी संस्कृतियाँ मॉडलिंग तथा प्रबलन के माध्यम से व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपने संवेगों को रूप से प्रकट करना सिखाती हैं।
द्वितीय, अधिगम उन उद्दीपकों पर बहुत निर्भर करता है जो सांवेगिक प्रतिक्रियाएँ जनित करते हैं। यह प्रदर्शित किया जा चुका है कि वे व्यक्ति जो लिफ्ट, मोटरगाडी इत्यादि के प्रति अत्यधिक भय (दुर्भति) प्रदर्शित करते हैं, उन्होंने यह भय मॉडल, प्राचीन अनुबंधन या परिहार अनुबंधन के द्वारा सीखे होते हैं।
यह उल्लेखनीय है कि संवेगों में अंतर्निहित प्रक्रियाएँ संस्कृति द्वारा प्रभावित होती हैं। सम्प्रति शोध विशेष रूप से इस प्रश्न पर केंद्रीकृत है कि संवेगों में कितनी सर्वव्यापकता अथवा सांस्कृतिक विशिष्टता पाई जाती है। इनमें से अधिकांश शोध मुख की अभिव्यक्तियों पर किए गए हैं क्योंकि मुख का प्रेक्षण सरलता से किया जा सकता है, वह जटिलताओं से अपेक्षाकृत मुक्त होता है तथा वह संवेग के आत्मनिष्ठ अनुभव तथा प्रकट अभिव्यक्ति के मध्य एक कड़ी का कार्य करता है। किंतु फिर भी इस बात पर बल देना आवश्यक है कि संवेग केवल मुख द्वारा ही अभिव्यक्त नहीं होते। एक अनुभव किया हुआ संवेग अन्य अवाचिक माध्यमों; जैसेटटकटकी लगाकर देखने, चेष्टा, पराभाषा तथा समीपस्थ व्यवहार इत्यादि से भी अभिव्यक्त होता है। चेष्टा (शरीर भाषा) के द्वारा व्यक्त संवेगात्मक अर्थ एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में भिन्न होता है। उदाहरण के लिए, चीन में ताली बजाना आकुलता या निराशा का सूचक है, तथा क्रोध को हँसी के द्वारा व्यक्त किया जाता है। मौन भी विभिन संस्कृतियों में भिन्न-भिन्न अर्थ व्यक्त करता है। उदाहरण के लिए, भारत में गहरे संवेग कभी-कभी मौन द्वारा अभिव्यक्त किए जाते हैं, जबकि पाश्चात्य देशों में यह व्याकुलता अथवा लज्जा को व्यक्त कर सकता है। टकटकी लगा कर देखने में भी सांस्कृतिक मिनताएँ पाई जाती हैं। यह भी देखा गया है कि लैटिन अमेरिकी तथा दक्षिण यूरोपीय लोग अंतःक्रिया कर रहे व्यक्ति की आँखों में टकटकी लगाकर देखते हैं, जबकि एशियाई लोग, विशेषकर भारतीय तथा पाकिस्तानी मूल के लोग, किसी अंतःक्रिया के दौरान दृष्टि को परिधि (अंतःक्रिया करने वाले से दूर से दृष्टिपात) पर केंद्रित करते हैं। संवेगात्मक आदान-प्रदान के दौरान, शारीरिक दूरी (सानिध्य) विभिन प्रकार के संवेगात्मक अर्थों को प्रकट करती है। उदाहरण के लिए, अमेरिकी लोग अंतःक्रिया करते समय बहुत निकट नहीं आना चाहते; जबकि भारतीय लोग निकटता का प्रत्यक्षण आरामदेह स्थिति के रूप में करते हैं। वास्तव में, कम दूरी में छूना या स्पर्श करना संवेगात्मक उष्णता या सहदयता का परिचायक समझा जाता है। उदाहरण के लिए, यह पाया गया कि अरबी मूल के लोग उन उत्तर अमेरिकी लोगों के प्रति विमुखता अनुभव करते हैं जो अंतःक्रिया के दौरान सूंघने की दूरी (अत्यधिक निकट) के बाहर रह कर ही अंतःक्रिया करना पसंद करते हैं।