English

उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था। - History (इतिहास)

Advertisements
Advertisements

Question

उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था।

Long Answer

Solution

  1.  बंधुत्व संबंधी ब्राह्मणीय नियम और उनका सर्वत्र अनुसरण-

    ‘कुल’ शब्द परिवार के लिए संस्कृत ग्रंथों में प्रयोग किया गया है और ‘जाति’ शब्द किसी बड़े समूह के लिए प्रयोग किया गया है। बहुधा अपने पारिवारिक जीवन को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं, पर परिवार में एक-दूसरे के साथ रिश्तों और क्रियाकलापों में भी भिन्नता है। कई बार एक ही परिवार के लोग भोजन और अन्य संसाधनों का आपस में मिल-बाँटकर इस्तेमाल करते हैं। एक साथ रहते और काम करते हैं। अनुष्ठानों को साथ ही संपादित करते हैं। परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं जिन्हें हम संबंधी कहते हैं। पारिवारिक रिश्ते ‘नैसर्गिक’ और रक्त संबद्ध माने जाते हैं। इतिहासकार परिवार और बंधुता संबंधी विचारों का विश्लेषण करते हैं। इनका अध्ययन इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे लोगों की सोच का पता चलता है। संभवत: इन विचारों ने लोगों के क्रियाकलापों को प्रभावित किया होगा।

    इसी तरह व्यवहार से विचारों में बदलाव आया होगा। महाभारत काल में राज्य परिवारों में बंधत्व संबंधों में बड़ा भारी परिवर्तन आया। एक स्तर पर महाभारत इसी की कहानी है। यह बांधवों के दो दलों, कौरवों और पांडवों के बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघर्ष का चित्रण करती है। दोनों ही दल कुरु वंश से संबंधित थे, जिनका एक जनपद पर शासन था। यह संघर्ष एक युद्ध में परिणत हुआ जिसमें पांडव विजयी हुए। इनके उपरांत पितृवंशिक उत्तराधिकार को उद्घोषित किया गया। हालाँकि पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी मौजूद थी, महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया। पितृवंशिकता में पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर (राजाओं के संदर्भ में सिंहासन पर भी) अधिकार जमा सकते थे। कभी पुत्र के न होने पर एक भाई दूसरे पर उत्तराधिकारी हो जाता था तो कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अपना अधिकार जमाते थे।

  2. विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियम और उसका सर्वत्र अनुसरण-

    जहाँ पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्त्वपूर्ण थे, वहाँ इस व्यवस्था में पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था। पैतृक संसाधनों पर उनका कोई अधिकार नहीं था। अपने गोत्र से बाहर उनका विवाह कर देना ही वांछित था। इस प्रथा को बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं और इसका तात्पर्य यह था कि ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बहुत सावधानी से नियमित किया जाता था जिससे उचित समय और ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह किया जा सके। इसका प्रभाव यह हुआ कि कन्यादान अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया। नये नगरों के उद्भव में सामाजिक जीवन अधिक जटिल हुआ।

    यहाँ पर निकट और दूर से आकर लोग मिलते थे और वस्तुओं की खरीद-फरोख्त के साथ ही इस नगरीय परिवेश में विचारों का भी आदान-प्रदान होता था। संभवतः इस वजह से आरंभिक व्यवहारों पर प्रश्नचिह्न लगाए गए। इस चुनौती के जवाब में ब्राह्मणों ने समाज के लिए विस्तृत आचार-संहिताएँ तैयार की। ब्राह्मणों को इस आचार-संहिताओं का विशेष रूप से पालन करना होता था, किंतु बाकी समाज को भी इसका अनुसरण करना पड़ता था। लगभग 500 ई०पू० से इन मानदंडों का संकलन धर्मसूत्र व धर्मशास्त्र नामक संस्कृत ग्रंथों में किया गया। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण मनुस्मृति थी जिसका संकलन लगभग 200 ई०पू० से 200 ईस्वी के बीच हुआ। हालाँकि इन ग्रंथों के ब्राह्मण लेखकों को यह मानना था कि उनका दृष्टिकोण सार्वभौमिक है और उनके बनाए नियमों का सबके द्वारा पालन होना चाहिए, किन्तु वास्तविक सामाजिक संबंध कहीं अधिक जटिल थे। इस बात को भी ध्यान में रखना जरूरी है कि उपमहाद्वीप में फैली क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं की वजह से भी ब्राह्मणों का प्रभाव सार्वभौमिक कदापि नहीं था।

shaalaa.com
बंधुता एवं विवाह अनेक नियम और व्यवहार की विभिन्नता
  Is there an error in this question or solution?
Chapter 3: बंधुत्व, जाति तथा वर्ग - अभ्यास [Page 81]

APPEARS IN

NCERT History [Hindi] Class 12
Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग
अभ्यास | Q 9. | Page 81
Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×