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Question
उस संवर्धन में जहाँ ई.कोलाई वृद्धि कर रहा हो लैक्टोज डालने पर लैक-ओपेरान उत्प्रेरित होता है। तब कभी संवर्धन में लैक्टोज डालने पर लैक ओपेरान कार्य करना क्यों बंद कर देता है?
Solution
ओपेरान संकल्पना मनुष्य की आँत में पाए जाने वाले जीवाणु ई. कोलाई सामान्यतया लैक्टोज के अपचय से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। जैकब एवं मोनाड (Jacob & Monod, 1961) ने पता लगाया कि इसके डीएनए में तीन जीन का एक समूह लैक्टोज का अपचय करने वाले तीन एंजाइम के संश्लेषण से सम्बंधित होता है। पोषण माध्यम में लैक्टोज होता है तो ये जीन सक्रिय होते हैं। पोषण माध्यम में लैक्टोज के अभाव में ये निष्क्रिय रहते हैं। जैकब एवं मोनाड ने इस जीन की सक्रियता के नियमन के लिए ओपेरान संकल्पना (operon concept) प्रस्तुत की।
ओपेरान संकल्पना के अनुसार जीन की सक्रियता का नियमन अनुलेखन स्तर पर प्रेरण या दमन (induction or repression) द्वारा होता है। लैक्टोज का अपचय करने वाले एंजाइम बीटा-गैलेक्टोसाइडेज (beta-galactosidase), गैलेक्टोज परमीएज (galactose permease) तथा थायोगैलेक्टोसाइडेज ट्रांसएसिटीलेज (thiogalactosidase transacetylase) हैं। इनके संरचनात्मक जीन्स (structural genes) को क्रमशः सिस्ट्रॉन-z, सीस्ट्रान-y तथा सीस्ट्रान-a द्वारा प्रदर्शित करते हैं। ये एक-दूसरे के निकट स्थित होते हैं। इनमें परस्पर समन्वय होता है।
तीन जीन इनको नियंत्रण करते हैं, इन्हें नियामक जीन (regulatory gene), उन्नायक जीन (promoter gene) तथा प्रचालक जीन (operator gene) कहते हैं। उपापचयी प्रणाली में एंजाइमों के लिए कूटलेखन करने वाले जीन आमतौर पर क्रामोसोम पर एक समूह के रूप में स्थित होते हैं। ये एक क्रियात्मक जटिल (functional complex) बनाती हैं। इस पूरे तंत्र को लैक ओपेरान कहते हैं। इसमें संरचनात्मक जीन (structural genes), उन्नायक जीन (promoter gene), प्रचालक जीन (operator gene) तथा नियामक जीन (regulatory gene) आदि मिलती हैं।
लैक ओपेरान = नियामक जीन + उन्नायक जीन + प्रचालक जीन + संरचनात्मक जीन लैक ओपेरान का प्रकार्य
- लैक्टोज की अनुपस्थिति में (In absence of Lactose) – लैक्टोज प्रेरक की अनुपस्थिति में
नियामक जीन एक लैक निरोधक या दमनकारी प्रोटीन बनाता है। यह प्रचालक जीन से बन्धित होकर इसके अनुलेखन को रोकता है। इसके फलस्वरूप संरचनात्मक जीन एमआरएनए का संश्लेषण नहीं कर पाते और प्रोटीन संश्लेषण रुक जाता है। यह दमनकारी (repression) का उदाहरण है। - लैक्टोज की उपस्थिति में (In presence of Lactose) – माध्यम में लैक्टोस प्रेरक के उपस्थित होने पर उन्नायक कोशिका में प्रवेश करके नियामक जीन से उत्पन्न दमनकारी से बन्धित होकर जटिल यौगिक बनाता है। इसके कारण दमनकारी प्रचालक से बन्धित नहीं हो पाता। और प्रचालक स्वतंत्र रहता है। यह आरएनए -पॉलिमरेज को उन्नायक जीन के समारम्भन स्थल से बन्धित होने के लिए प्रेरित करता है जिसके फलस्वरूप पॉलिसिस्ट्रोनिक लैक एमआरएनए का अनुलेखन होता है। यह लैक्टोज अपचय के लिए आवश्यक तीनों एंजाइम को कूटलेखन करता है। इस क्रिया को एंजाइम उत्प्रेरक कहते हैं। यह उत्प्रेरक या प्रेरण (induction) का उदाहरण है। इसमें लैक्टोज उत्प्रेरक का कार्य करता है।
- सह-दमनकारी (Co-repressor) – कभी-कभी उपापचय (लैक्टोज) से बन्धित होने पर निरोधक या दमनकारी की संरचना में परिवर्तन हो जाता है। यह प्रचालक से बन्धित होकर इसके अनुलेखन (transcription) को रोकता है। इसमें उपापचय (लैक्टोज) को सह-दमनकारी कहते हैं, क्योंकि यह प्रचालक स्थल (operator site) को निष्क्रिय करने के लिए दमनकारी को सक्रिय करता है।