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Question
वे कौन से मुद्दे थे जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर क्षेत्रों के प्रति मुग़ल नीतियों व विचारों को आकार प्रदान किया?
Long Answer
Solution
- मुगल बादशाह देश की सीमाओं से परे भी अपने राजनैतिक दावे प्रस्तुत करते थे। अपने साम्राज्य की सीमाओं की सुरक्षा, पड़ोसी देशों से यथासंभव मैत्रीपूर्ण संबंधों की स्थापना, आर्थिक और धार्मिक हितों की रक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों का भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर क्षेत्रों के प्रति मुग़ल नीतियों एवं विचारों को आकार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण स्थान था। मुग़ल सम्राटों ने इन्हीं मुद्दों को ध्यान में रखते हुए उपमहाद्वीप से बाहर के क्षेत्रों के प्रति अपनी नीतियों का निर्धारण किया। मुगल तथा कंधार ।
- मध्यकाल में अफ़गानिस्तान को ईरान और मध्य एशिया के क्षेत्रों से अलग करने वाले हिंदूकुश पर्वतों द्वारा निर्मित सीमा का विशेष महत्त्व था। मुगल शासकों के ईरान एवं तूरान के पड़ोसी देशों के साथ राजनैतिक एवं राजनयिक संबंध इसी सीमा के नियंत्रण पर निर्भर करते थे। उल्लेखनीय है कि भारतीय उपमहाद्वीप में आने का इच्छुक कोई भी विजेता हिंदूकुश पर्वत को पार किए बिना उत्तर भारत तक पहुँचने में सफल नहीं हो सकता था। अत: मुग़ल शासक उत्तरी-पश्चिमी सीमांत में सामरिक महत्त्व की चौकियों विशेष रूप से काबुल और कंधार पर अपना कुशल नियंत्रण स्थापित करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे।
- मुगलों के लिए काबुल की सुरक्षा के लिए कंधार पर अधिकार करना नितांत आवश्यक था, क्योंकि कंधार के आस-पास का प्रदेश खुला होने के कारण कंधार की ओर से काबुल पर भी आक्रमण हो सकता था। अत: मुग़ल सम्राट कंधार, जो मुग़ल साम्राज्य की सुरक्षा की प्रथम पंक्ति का निर्माण करता था, पर अधिकार बनाए रखने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे।
- भारत और पश्चिमी एशिया तथा यूरोप तक के व्यापार के स्थल मार्ग पर स्थित होने के कारण कंधार व्यापारिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था। समुद्र पर पुर्तगाली शक्ति का आधिपत्य स्थापित हो जाने के कारण मध्य एशिया का समस्त व्यापार इसी मार्ग से होता था। अत: कंधार जैसे सामरिक एवं व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र पर अपनी प्रभुत्व स्थापित करना मुग़ल सम्राटों की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था। कंधार मुग़ल तथा ईरानी साम्राज्य की सीमा पर स्थित था, अत: दोनों ही साम्राज्यों के लिए इसका विशेष महत्त्व था।
परिणामस्वरूप दोनों शक्तियाँ कंधार पर अपना अधिकार बनाए रखने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहीं। 1545 ई० में मुग़ल सम्राट हुमायूँ ने कंधार पर अधिकार कर लिया, किन्तु दो वर्ष बाद ही इस पर ईरान ने भी अधिकार कर लिया। 1595 ई० में अकबर के शासनकाल में कंधार पर मुग़लों का प्रभुत्व स्थापित हो गया किन्तु 1622 ई० में यह उनके हाथों से निकल गया। 1638 ई० में मुग़लों ने कंधार पर अधिकार कर लिया, किन्तु 1649 ई० में कंधार पर पुनः ईरान का अधिकार हो गया। तत्पश्चात् बार-बार प्रयास करने पर भी कंधार को मुगल साम्राज्य का अंग नहीं बनाया जा सका।
मुगल तथा ऑटोमन साम्राज्य ऑटोमन साम्राज्य के साथ संबंधों के निर्धारण में मुगलों का प्रमुख उद्देश्य ऑटोमन नियंत्रण वाले क्षेत्रों, विशेष रूप से हिजाज अर्थात् ऑटोमन अरब के उस भाग जहाँ मक्का एवं मदीना के महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल स्थित थे, में व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के स्वतंत्र आवागमन को बनाए रखना था। उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र के साथ अपने संबंधों के निर्धारण में मुगल शासक सामान्य रूप से धर्म और वाणिज्य के विषयों को मिलाकर देखते थे। साम्राज्य लाल सागर के बंदरगाहों-अदन और मोखा को बहुमूल्य वस्तुओं के निर्यात हेतु प्रोत्साहित करता था। इनकी बिक्री से जो आय होती थी, उसे उस क्षेत्र के धर्मस्थलों एवं फ़कीरों को दान कर दिया जाता था।
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मुग़ल शासक और उनका साम्राज्य
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