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विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फ़र्क था? - History (इतिहास)

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Question

विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फ़र्क था?

Long Answer

Solution

विद्रोही भारत से ब्रिटिश शासन सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहते थे। विभिन्न सामाजिक समूह एक सामान्य उद्देश्य से संघर्ष में भाग ले रहे थे और वह सामान्य उद्देश्य था-‘ भारत से ब्रिटिश शासन सत्ता को उखाड़ फेंकना।’ यही कारण था कि इस विद्रोह को अंग्रेजों के विरुद्ध एक ऐसे संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसमें सभी लाभ-हानि के समान रूप से भागीदार थे। वास्तव में, ब्रिटिश शासन के अधीन भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग के हितों को हानि पहुँची थी। अतः उनमें ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध असंतोष चरम सीमा पर पहुँच गया था। विभिन्न सामाजिक समूह अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए विद्रोह में सम्मिलित हुए थे। अतः एक सामान्य उद्देश्य होते हुए भी उनकी दृष्टि में अंतर था।

शासक एवं शासक वर्ग से संबंधित लोग जैसे मुगल सम्राट, बहादुरशाह द्वितीय, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, पेशवा वाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहब, अवध की बेगम हजरत महल, आरा के राजा कुँवरसिंह, जाट नेता शाहमल, बड़े-बड़े जागीरदार और ताल्लुकदार भारत से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ कर अपने-अपने राज्यों एवं जागीरों को पुनः प्राप्त करना चाहते थे। ब्रिटिश प्रशासकों ने साधनों के औचित्य अथवा अनौचित्य की कोई परवाह न करते हुए कहीं छल, कहीं बल तो कहीं बिना किसी आड़ के ही अधिकाधिक भारतीय राज्यों एवं रियासतों का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में कर लिया था। ब्रिटिश प्रशासन ने जमींदारी बंदोबस्त के अंतर्गत भू-राजस्व के रूप में विशाल धनराशि जमींदारों पर थोप दी।

बकाया लगान के कारण उनकी जागीरों को नीलाम कर दिया जाता था। किसी जनाना नौकर अथवा गुलाम द्वारा दायर किए मुकदमें में भी उन्हें अदालत में उपस्थित होना पड़ता था। उन्हें स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों आदि के लिए विशाल धनराशि चंदे के रूप में देनी पड़ती थी। ब्रिटिश शासन के समाप्त हो जाने से उन्हें इन सभी समस्याओं से छुटकारा मिल सकता था। भारतीय व्यापारी भी ब्रिटिश शासन से संतुष्ट नहीं थे। सरकार की व्यापारिक चुंगी, कर तथा परिवहन संबंधी नीतियाँ भारतीय उद्योगपतियों एवं व्यापारियों के हितों के विरुद्ध थीं। देश के आंतरिक एवं बाह्य व्यापार पर विदेशी उद्योगपतियों का नियंत्रण था। भारतीय व्यापारी चाहते थे कि उन्हें आंतरिक और बाह्य व्यापार में विदेशी व्यापारियों के समान सुविधाएँ प्राप्त हों तथा उनके परम्परागत लेन-देन के ढंग और बही-खातों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न किया जाए।

किसान चाहते थे कि भू-राजस्व की दर उदार हो, कर-संग्रह के साधन कठोर न हों और भुगतान न कर पाने की स्थिति में उनकी भूमि को नीलाम न किया जाए। वे चाहते थे कि सरकार ज़मींदारों और महाजनों के शोषण एवं अत्याचारों से किसानों की रक्षा करे तथा कृषि को उन्नत एवं गतिशील बनाया जाए। ब्रिटिश प्रशासन की आर्थिक नीतियों ने भारत के परम्परागत आर्थिक ढाँचे को नष्ट करके भारतीय दस्तकारों एवं कारीगरों की दशा को दयनीय बना दिया था। इंग्लैंड में निर्मित वस्तुओं को ला-लाकर यूरोपीयों ने भारतीय बुनकरों, लोहारों, मोचियों आदि को बेरोजगार कर दिया था। भारतीय कारीगरों और दस्तकारों को विश्वास था कि भारत से ब्रिटिश शासन समाप्त कर दिए जाने पर निश्चित रूप से उनकी स्थिति उन्नत होगी। उनके उत्पादों की माँग बढ़ जाएगी और उन्हें राजाओं और अमीरों की सेवा में नियुक्त किया जाएगा।

इसी प्रकार, सरकारी कर्मचारी चाहते थे कि उनके साथ सम्मानजनक बर्ताव किया जाए, उन्हें प्रशासनिक एवं सैनिक सेवाओं में प्रतिष्ठा और धन वाले पदों पर नियुक्त किया जाए तथा अंग्रेजों के समान वेतन एवं शक्तियाँ प्रदान की जाएँ। उन्हें लगता था कि देश में बादशाही सरकार की स्थापना हो जाने से उनकी इन सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। पंडित, फकीर एवं अन्य ज्ञानी व्यक्ति भी ब्रिटिश शासन के विरोधी थे। उन्हें लगता था कि ब्रिटिश प्रशासक उनके धर्म को नष्ट करके उन्हें ईसाई बना देना चाहते हैं। ब्रिटिश सत्ता को भारत से उखाड़कर वे भारतीय धर्मों एवं संस्कृति की रक्षा करना चाहते थे। वास्तव में, विद्रोही भारत से ब्रिटिश सत्ता को समाप्त करके देश में 18वीं शताब्दी की पूर्व ब्रिटिश व्यवस्था की पुनस्र्थापना करना चाहते थे। यही कारण था कि उन्होंने ब्रिटिश शासन के पतन के बाद दिल्ली, लखनऊ और कानपुर जैसे स्थानों में एक प्रकार की सत्ता एवं शासन संरचना की स्थापना का प्रयास किया।

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विद्रोही क्या चाहते थे?
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Chapter 11: विद्रोही और राज - अभ्यास [Page 315]

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NCERT History [Hindi] Class 12
Chapter 11 विद्रोही और राज
अभ्यास | Q 7. | Page 315
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