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प्रश्न
अधिगम के लिए तत्परता के विचार का क्या अर्थ है?
उत्तर
विभिन्न प्रजातियों के प्राणी अपनी संवेदी क्षमताओं तथा अनुक्रिया करने की योग्यताओं में एक-दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं। साहचर्यों को स्थापित करने के लिए जरुरी क्रियाविधियाँ जैसे उद्दीपक-उद्दीपक अथवा उद्दीपक-अनुक्रिया भी भिन्न-भिन्न प्रजातियों में भिन्न-भिन्न होती है। इसका आशय यह है कि प्रत्येक प्रजाति के प्राणियों में अधिगम की क्षमता उनकी जैविक क्षमता के कारण परिसीमीत हो जाती है। कोई प्राणी सीखते समय किस प्रकार के उद्दीपक-उद्दीपक या उद्दीपक-अनुक्रिया साहचर्य निर्मित कर सकेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे प्रकृति द्वारा किस सीमा तक साहचर्य कार्यविधि संबंधी आनुवंशिक क्षमता प्राप्त हुई है। एक विशेष प्रकार का सहचारी अधिगम मनुष्यों तथा वनमानुषों के लिए तो आसान है परंतु बिल्लियों तथा चूहों के लिए वैसे साहचर्यों का सीखना अत्यंत कठिन होता है और कभी-कभी तो असंभव भी होता है। इसका अर्थ यह है कि कोई प्राणी मात्र उन्हीं साहचर्यों को सीख सकता है, जिसका लिए वह अनुवांशिक रूप से सक्षम है।
तत्परता के संप्रत्यय को एक ऐसी सतत विमा या आयाम के रूप में समझा जा सकता है जिसके एक छोर पर वे साहचर्य या सीखे जाने वाले कार्य रखे जा सकते हैं जिनको सीखना किसी प्रजाति के प्राणियों के लिए सरल है तथा दूसरे छोर पर वे साहचर्य या सीखे जाने वाले कार्य रखे जा सकते हैं, जिन्हें सीखने के लिए प्रजाति के प्राणियों में तत्परता बिल्कुल भी नहीं है। अतः वे उन्हें नहीं सीख सकते। इस विमा के दोनों छोरों के बीच के विभिन्न स्थानों पर वे कार्य या साहचर्य रखे जा सकते हैं, जिन्हें सीखने के लिए प्राणी न तत्पर है न उसमें तत्परता का अभाव है। वे ऐसे कार्यों को सीख तो सकते हैं परंतु कठिनाई और सतत प्रयास के पश्चात्।