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प्रश्न
बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व सँभालने के लिए पुराने शासकों से क्यों आग्रह किया?
उत्तर
1857 ई० की महान क्रान्ति, जिसे ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’, ‘सैनिक विद्रोह’, ‘हिन्दू-मुस्लिम संगठित षड्यंत्र’ आदि नामों से भी जाना जाता है, का बिगुल सैनिकों ने बजाया और चर्बी वाले कारतूसों का मामला विद्रोह का तात्कालिक कारण बना। किन्तु शीघ्र ही यह विद्रोह जन-विद्रोह बन गया। लाखों कारीगरों, किसानों और सिपाहियों ने कंधे से कंधा मिलाकर एक वर्ष से भी अधिक समय तक ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया। विद्रोहियों का प्रमुख उद्देश्य था- भारत से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकना। वास्तव में, विद्रोही सिपाही भारत से ब्रिटिश सत्ता को समाप्त करके देश में 18वीं शताब्दी की पूर्व ब्रिटिश व्यवस्था की पुनस्र्थापना करना चाहते थे। ब्रिटिश शासकों ने भारतीय राजघरानों का अपमान किया था। साधनों के औचित्य अथवा अनौचित्य की कोई परवाह न करते हुए कहीं छल, कहीं बल, तो कहीं बिना किसी आड़ के ही अधिकाधिक भारतीय राज्यों एवं रियासतों का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में कर लिया गया था। परिणामस्वरूप, उनमें ब्रिटिश शासन के विरुद्ध घोर असंतोष व्याप्त था।
विशाल संसाधनों के स्वामी अंग्रेजों का सामना करने के लिए नेतृत्व और संगठन की अत्यधिक आवश्यकता थी। नि:संदेह, योग्य नेतृत्व और संगठन के बिना विद्रोह का कुशलतापूर्वक संचालन नहीं किया जा सकता था। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विद्रोही ऐसे लोगों की शरण में गए, जो भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे और जिन्हें नेतृत्व एवं संगठन के क्षेत्र में अच्छा अनुभव था। इसलिए विद्रोही सिपाहियों ने अनेक स्थानों पर पुराने शासकों को विद्रोह का नेतृत्व सँभालने के लिए आग्रह किया। मेरठ में विद्रोह करने के बाद सिपाहियों ने तत्काल दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया था। दिल्ली मुग़ल साम्राज्य की राजधानी थी और मुग़ल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय दिल्ली में निवास करता था।
दिल्ली पहुँचते ही सिपाहियों ने वृद्ध मुग़ल सम्राट से विद्रोह का नेतृत्व सँभालने का अनुरोध किया था, जिसे सम्राट ने कुछ हिचकिचाहट के बाद स्वीकार कर लिया था। इसी प्रकार, कानपुर में सिपाहियों और शहर के लोगों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब को अपना नेता बनाया था। उनकी दृष्टि में नाना साहिब एक योग्य और अनुभवी नेता थे, जिन्हें नेतृत्व एवं संगठन का पर्याप्त अनुभव था। इसी प्रकार, झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई, बिहार में आरा के स्थानीय जमींदार कुँवरसिंह और लखनऊ में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के युवा पुत्र बिरजिस कादर को विद्रोह का नेता घोषित किया गया था। पुराने शासकों को विद्रोह का नेतृत्व करने का आग्रह करके सिपाही विद्रोह को एक व्यापक जन विद्रोह बनाना चाहते थे। जनसाधारण को अपने पुराने शासकों से पर्याप्त लगाव था। उन्हें लगता था कि ब्रिटिश शासकों ने अनुचित रूप से उन्हें उनकी सत्ता से वंचित कर दिया था। ऐसे शासकों का नेतृत्व उनके विद्रोह को शक्तिशाली और जनप्रिय बना सकता था।
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