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प्रश्न
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की किस हद तक भूमिका थी?
उत्तर
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की अहम् भूमिका थी। बैरकपुर की एक घटना ऐसी ही थी जिसका संबंध गाय और सूअर की चर्बी लिपटे कारतूसों से था। जब मेरठ छावनी में अंग्रेज़ अधिकारियों ने भारतीय सैनिकों को चर्बी लिपटे कारतूस को मुँह से खोलने के लिए मजबूर किया तो मेरठ के सिपाहियों ने सभी फिरंगी अधिकारियों को मार दिया और हिंदू और मुसलमान सभी सैनिक अपने धर्म को भ्रष्ट होने से बचाने के तर्क के साथ दिल्ली में आ गए थे। हिंदू और मुसलमानों को एकजुट होने और फिरंगियों का सफाया करने के लिए कई भाषाओं में अपीलें जारी की गईं। विद्रोह का संदेश कुछ स्थानों पर आम लोगों के द्वारा, तो कुछ स्थानों पर धार्मिक लोगों के द्वारा फैलाए गए।
उदाहरण के लिए मेरठ के बारे में इस प्रकार की खबर फैली थी कि वह हाथी पर सवार एक फकीर आता है जिससे सिपाही बार-बार मिलने आते हैं। लखनऊ में अवध पर कब्जे के बाद बहुत सारे धार्मिक नेता और स्वयंभू ‘पैगंबर’ प्रचारक ब्रिटिश राज को समाप्त करने की अलख जगा रहे थे। सिपाहियों ने जगह-जगह छावनियों में कहलवाया कि यदि वे गाय और सूअर की चर्बी के कारतूसों को मुँह से लगाएँगे तो उनकी जाति और धर्म दोनों भ्रष्ट हो जाएँगे। अंग्रेजों ने सिपाहियों को बहुत समझाया, लेकिन वे टस-से-मस नहीं हुए।
1857 के प्रारंभ में एक अफवाह यह भी जोरों पर थी कि अंग्रेज सरकार ने हिंदू धर्म और मुस्लिम धर्म को नष्ट करने के लिए एक साजिश रच ली है। कुछ राष्ट्रवादी लोगों ने यह भी अफ़वाह उड़ा दी कि बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सूअर का चूरा अंग्रेज़ों ने मिलवा दिया है। लोगों में यह डर फैल गया कि अंग्रेज़ हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं। कुछ योगियों ने धार्मिक स्थानों, दरगाहों और पंचायतों के माध्यम से इस भविष्यवाणी पर बल दिया कि प्लासी के 100 साल पूरा होते ही अंग्रेजों का राज 23 जून, 1857 को खत्म हो जाएगा। कुछ लोग गाँव में शाम के समय चपाती बँटवाकर यह धार्मिक शक फैला रहे थे कि अंग्रेजों का शासन किसी उथल-पुथल का संकेत है।
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