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प्रश्न
‘क्षमाशीलता दुर्बलता नहीं’, इस विचार पर टिप्पणी तैयार कीजिए।
उत्तर
‘मा’ शब्द सहनशीलता तथा अहंकार के त्याग का सूचक है। क्षमा सभी धर्मों का आधार है। क्षमा देने वाले की तरह क्षमा माँगने वाला भी श्रेष्ठ है। क्षमा के धरातल पर दो व्यक्तित्व उभरते हैं एक आप और एक सामने वाला। क्षमायाचना करने के लिए हममें अपनी गलती, असफलता और कमजोरी को स्वीकार करने की क्षमता होनी जरूरी है। पर निरंतर जीत के लिए हम इतने अभिलाषी होते हैं कि अपनी गलतियों और कमजोरियों को स्वीकार करने की हमें अवकाश ही नहीं मिलती। क्षमायाचना और क्षमादान मानसिक वातावरण से संबद्ध हैं। मनुष्य स्वयं में स्वतंत्र लक्ष्य लेकर आया है। हमें उसका आदर करना चाहिए, लक्ष्यपूर्ति में सहयोग करना चाहिए, क्षमायाचना उसके समक्ष एक सौम्य वातावरण की सृष्टि करती है कि वह क्षमाशील बने। वास्तव में क्षमा की अवधारणा स्वयं से आरंभ होती है। अपनी भूलों के लिए स्वयं से क्षमा मांगना, दूसरों से क्षमा माँगना, प्रभु से क्षमा माँगना ये क्षमायाचना के उत्क्रम हैं। क्षमा में कण लेशमात्र भी कायरता नहीं है। सहिष्णुता, समता, सहनशीलता, मैत्रीभाव और उदारता जैसे सामर्थ्य युक्त गुण, पुरुषार्थहीन या धैर्यहीन लोगों में उत्पन्न नहीं हो सकते। क्षमा ही दुखों से मुक्ति का द्वार है। क्षमा मन की कुंठित गांठों को खोलती है और दया, सहिष्णुता, उदारता, संयम और संतोष को विकसित करती है। क्षमाभाव मानवता के लिए वरदान है।
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