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कुटज क्या केवल जी रहा है- लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है? - Hindi (Elective)

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प्रश्न

कुटज क्या केवल जी रहा है- लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमज़ोरियों पर टिप्पणी की है?

संक्षेप में उत्तर

उत्तर

लेखक यह प्रश्न उठाकर मानवीय कमज़ोरियों पर प्रहार करता है। लेखक के अनुसार कुटज का वृक्ष जीता ही नहीं बल्कि यह सिद्ध कर देता है कि मनुष्य में यदि जीने की ललक है, तो वह किसी भी प्रकार की परिस्थितियों से सरलतापूर्वक निकल सकता है। इस प्रकार जीने में वह अपने आत्मसम्मान तथा गौरव दोनों की रक्षा करता है। किसी से सहायता नहीं लेता बल्कि साहसपूर्वक जीता है। लेखक केवल जीने से यह प्रश्न उठाता है कि कुटज का स्वभाव ऐसा नहीं है। वह जीने के लिए नहीं जी रहा है। इसके लिए उसमें दृढ़ विश्वास है।
यह प्रश्न उन मानवों को लक्ष्य करके बनाया गया है, जो जीवन की थोड़ी-सी कठिनाइयों के आगे घुटने टेक देते हैं। उनके पास जीने की वजह होती ही नहीं है, बस जीने के लिए जीते हैं। ऐसे लोगों में साहस, जीने की ललक की कमी होती है। ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

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कुटज
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अध्याय 2.1: हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज) - प्रश्न-अभ्यास [पृष्ठ १६८]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Hindi - Antara Class 12
अध्याय 2.1 हजारी प्रसाद द्विवेदी (कुटज)
प्रश्न-अभ्यास | Q 7. | पृष्ठ १६८

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