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प्रश्न
लघु निबंध लिखें -
संस्कार और पंथनिरपेक्षीकरण
संक्षेप में उत्तर
उत्तर
संस्कार और पंथनिरपेक्षीकरण
- इसका तात्पर्य सामान्यतः धर्म के प्रभाव में कमी के रूप में होता है।
- धर्मनिरपेक्षीकरण के सूचकों में मनुष्य का धार्मिक संगठनों से संबंध (जैसे चर्च में उनकी उपस्थिति), धार्मिक संस्थानों का सामाजिक तथा भौतिक प्रभाव और लोगों के धर्म में विश्वास करने की सीमा है।
- लेकिन यह मान्यता है कि आधुनिक समाज उत्तरोतर धर्मनिरपेक्ष हो रहा है, यह भी सही नहीं है।
- भारत में किए जाने वाले कुछ अनुष्ठानों में धर्मनिरपेक्षीकृत प्रभाव भी रहा है।
- अनुष्ठानों में धर्मनिरपेक्षता के कई आयाम होते हैं। वे पुरुषों तथा महिलाओं को अपने मित्रों तथा बड़े लोगों से घुलने-मिलने का अवसर प्रदान करते हैं।
- वे परिवार की संपत्ति, कपड़े तथा आभूषण को प्रदर्शित करने का भी अवसर प्रदान करते हैं।
- पिछले कुछ दशकों से अनुष्ठानों के आर्थिक, राजनीतिक और प्रस्थिति आयामी पक्ष ज्यादा उभरकर सामने आए हैं। जाति और धर्मनिरपेक्षीकरण
- परंपरागत रूप से भारत में जाति व्यवस्था धार्मिक दायरे में क्रियाशील थी। पवित्र-अपवित्र से संबंधित विश्वास व्यवस्था इस क्रियाशीलता का केंद्र थी। भारत में जाति संगठनों और जातिगत राजनीतिक दलों का उद्भव हुआ है। वे राज्यों पर दबाव कायम करते हैं।
- जाति की इस बदली हुई भूमिका को जाति का धर्मनिरपेक्षीकरण कहा गया है।
- भारत की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था जातिगत संरचना तथा जातिगत पहचान के रूप में संगठित थी। जाति और राजनीति के संबंध की व्याख्या करते हुए आधुनिकता के सिद्धांत से बना नजरिया एक प्रकार के भय से ग्रसित होता है।
- राजनीतिज्ञ जाति समूहों को इकट्ठा करके अपनी शक्ति में संगठित करते हैं। वहाँ जहाँ अलग प्रकार के समूह और संस्थाओं के अलग आधार होते हैं, राजनीतिज्ञ उन तक भी पहुँचते हैं। जिस प्रकार से वे कभी भी ऐसी संस्थाओं के स्वरूपों को परिवर्तित करते हैं, वैसे ही जाति के स्वरूपों को भी परिवर्तित करते हैं। लिंग और संस्कृतीकरण
- संस्कृतीकरण ने महिलाओं के पारंपरिक जीवनशैली पर जोर दिया, किंतु पुरुषों के लिए आधुनिक तथा पश्चिमी शैली का समर्थन किया।
- संस्कृतीकरण के अधिकांश समर्थकों ने महिलाओं को घर की चारदीवारी के भीतर जीवन व्यतीत करने का समर्थन किया। उन लोगों ने महिलाओं की भूमिका को एक माँ, बहन अथवा बेटी के रूप में ही सीमित रहने पर बल दिया।
- वे महिलाओं से माता-पिता की इच्छा के मुताबिक पारंपरिक रूप से ही शादी-ब्याह करने की अपेक्षा रखते थे।
कुमुद पावड़े ने एक छात्र के रूप में विभिन्न साहित्यों के माध्यम से यह जाना कि इनमें महिलाओं तथा दलितों को लेकर कौन-सी अवधारणा है। जैसे-जैसे वो अपने अध्ययन को लेकर आगे बढ़ी उसे अनेक प्रकार की सामाजिक प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ी जिनमें आश्चर्य से लेकर ईष्र्या तक सम्मिलित थी। साथ ही उसमें संरक्षित स्वीकृति से लेकर पूर्ण अस्वीकृति तक के पक्ष सम्मिलित थे। वे कहती हैं-“मैंने कभी सुना था, जो जन्म से मिला हो और जो मरने के बाद भी नष्ट न हो-क्या वही जाति है।”
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सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न प्रकार
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