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प्रश्न
संस्कृतीकरण पर एक आलोचनात्मक लेख लिखें।
संक्षेप में उत्तर
उत्तर
- संस्कृतीकरण शब्द का प्रतिपादन एम.एन. श्रीनिवास ने किया। संस्कृतीकरण का अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिसके अंतर्गत निचली जाति अथवा जनजाति या अन्य समूह उच्च जातियों, विशेषतः द्विज जातियों की जीवन पद्धति, रीति-रिवाज, मूल्य, विचारधारा तथा आदर्शों का अनुकरण करते हैं।
- संस्कृतीकरण का प्रभाव भाषा, साहित्य, विचारधारा, संगीत, नृत्य, नाटक, कर्मकांड तथा जीवन शैली में देखे जा सकते हैं।
- यह एक प्रारंभिक प्रक्रिया है, जो कि हिंदू समाज में अपघटित होती है तथापि श्रीनिवास का मानना है कि यह गैर हिंदू समाज में भी दिखलाई पड़ती हैं।
- यह प्रक्रिया विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से होती है। उन क्षेत्रों में जहाँ की उच्च संस्कृतीकरण जातियों का प्रभुत्व था, वहाँ बड़े पैमाने पर संस्कृतीकरण हुआ। उन क्षेत्रों में जहाँ कि गैर संस्कृतीकरण जातियों का प्रभाव था, वहाँ इन्हीं जातियों का प्रभाव रहा। इसे विसंस्कृतीकरण का नाम दिया गया।
- श्रीनिवास का मानना है कि किसी भी समूह का संस्कृतीकरण उसकी अवस्था को जातियों के अधिक्रम में उसे उच्च श्रेणी की तरफ ले जाता है। सामान्यतः यह माना जाता है कि संस्कृतीकरण संबंधित समूह की आर्थिक अथवा राजनीतिक स्थिति में सुधार है अथवा हिंदुत्व की महान परंपराओं का किसी स्रोत के साथ उसका संपर्क परिणामस्वरूप इस समूह में उच्च चेतना स्रोत के साथ उभरता है। महान परंपराओं को यह स्रोत कोई तीर्थस्थान हो सकता है, कोई गढ़ हो सकता है अथवा कोई मतांतर वाला संप्रदाय हो सकता है।
- किंतु भारत में उच्च जातियों की परंपराओं को निम्न जातियों के द्वारा अपनाया जाना बेहद कठिन है, क्योंकि इसमें कई रुकावटें हैं। पारंपरिक रूप से निम्न जाति के जो लोग इस तरह के काम करने की चेष्टा करते थे, उन्हें उच्च जाति के लोग दंडित करते थे।
- संस्कृतीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत व्यक्ति सांस्कृतिक दृष्टि से प्रतिष्ठित समूहों के रीति-रिवाज तथा नामों का अनुकरण कर अपनी प्रस्थिति को उच्च बनाते हैं। संदर्भ प्रारूप सामान्यतः आर्थिक रूप से बेहतर होता है। दोनों ही स्थितियों में जब व्यक्ति धनवान हो जाता है, तो प्रतिष्ठित समूहों के द्वारा उसे स्वीकार किया जाता है।
संस्कृतीकरण की आलोचना
- इस बात की आलोचना की जाती है कि इसमें सामाजिक गतिशीलता निम्न जाति का सामाजिक स्तरीकरण में उर्ध्वगामी परिवर्तन कराती है, अतिशयोक्तिपूर्ण है। इस प्रक्रिया से कोई संरचनात्मक परिवर्तन न होकर केवल कुछ व्यक्तियों की स्थिति में परिवर्तन होता है। कुछ व्यक्ति असमानता पर आधारित सामाजिक संरचना में, अपनी स्थिति में तो सुधार कर लेते हैं, लेकिन इनसे समाज में व्याप्त असमानता कम नहीं होती। इस अवधारणा की विचारधारा में उच्चजाति की जीवनशैली उच्च तथा निम्न जाति की जीवन शैली निम्न है। अतः उच्च जाति के लोगों की जीवनशैली का अनुकरण करने की इच्छा को वांछनीय तथा प्राकृतिक मान लिया गया है।
- संस्कृतीकरण की अवधारणा असमानता तथा अपवर्जन पर आधारित प्रारूप को सही ठहराती है। यह पवित्रता तथा अपवित्रता के जातिगत पक्षों को उपयुक्त मानती है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि उच्च जाति के द्वारा निम्न जाति के प्रति भेदभाव एक प्रकार का विशेषाधिकार है। इससे पता चलता है कि असमानता की विचारधारी हमारे जीवन में कितना प्रवेश कर गई है। समानता वाले समाज की आकांक्षा के वजाय वर्जित समाज एवं भेदभाव को अपने तरीके से अर्थ देकर बहिष्कृत स्तरों को स्थापित किया गया। इससे एक अलोकतांत्रिक समाज का गठन हुआ।
- संस्कृतीकरण के कारण उच्च जाति के अनुष्ठानों, रीति-रिवाजों की स्वीकृति मिलने के कारण लड़कियों तथा महिलाओं को असमानता की सीढी में सबसे नीचे धकेल दिया गया तथा कन्यामूल्य के स्थान पर दहेज
प्रथा और अन्य समूहों के साथ जातिगत भेदभाव बढ़ गए। - संस्कृतीकरण में दलित संस्कृति तथा दलित समाज के मूलभूत पक्षों को भी पिछड़ापन मान लिया जाता है। उदाहरण के तौर पर, निम्न जाति के लोगों के द्वारा किए गए श्रम को निम्न तथा शर्मनाक माना जाता है। निम्न जाति से जुड़े सभी कार्यो; जैसे-शिल्प, तकनीकी योग्यता आदि को गैर उपयोगी मान लिया जाता है।
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सामाजिक परिवर्तन के विभिन्न प्रकार
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