संत कबीर गुरु और शिष्य के संबंध को समझाते हुए कहते हैं कि एक शिष्य को अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखना चाहिए। उसे चाहिए कि वह अपना सब कुछ गुरु को अर्पित कर दे और पूरी निष्ठा के साथ उनकी शरण में आ जाए। शिष्य को अपने भीतर के अहंकार को त्याग देना चाहिए और गुरु को ही अपना सब कुछ मानना चाहिए। वहीं, एक गुरु का कर्तव्य है कि वह अपने शिष्य का हर प्रकार से मार्गदर्शन करे, उसे ज्ञान देकर योग्य बनाए और उससे किसी प्रकार की कोई अपेक्षा न रखे।
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प्रश्न
निम्नलिखित पठित पद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
सिष को ऐसा चाहिए, गुरु को सब कुछ देय। कबिरा संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास। दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय। गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़-गढ़ काढ़े खोट। |
- आकलन:
विशेषताएँ लिखिए: [2]- गुरु ....................
- शिष्या ....................
- सरल अर्थ: [2]
प्रथम दो पंक्तियों का सरल अर्थ 25 से 30 शब्दों में लिखिए।
आकलन
उत्तर
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- गुरु − जो शिष्य से कुछ नहीं ले।
- शिष्या − जो गुरु को सब कुछ दे।
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