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प्रश्न
संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए-
जान घनआनंद यों मोहिं तुम्है पैज परी ______ कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलि है।
उत्तर
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ अंतरा भाग-2 नामक पुस्तक में संकलित कवित्त से ली गई हैं। इसके रचयिता रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि घनानंद है। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि प्रेमिका के वियोग के कारण अपनी दुःखद स्थिति का वर्णन करता है। वह प्रेमिका के निष्ठुर व्यवहार से दुखी है और कहता है कि तुम इस प्रकार का व्यवहार मेरी ओर से कब तक रखोगी। मैं तुम्हें इसे छोड़ने पर विवश कर दूँगा।
व्याख्या- घनानंद कहते हैं कि हे सुजान! मेरी तुमसे इस विषय बहस हो ही गई है। तुम्हें ही अपनी जिद्द छोड़कर बोलना ही पड़ेगा। सुजान तुम्हें यह जानना ही होगा कि पहले कौन बोलता है। लगता है तुमने अपने कानों में रूई डाली हुई है। इस तरह तुम कब तक मेरी बात नहीं सुनने का बहाना बनाओगी। आखिर कभी तो ऐसा दिन आएगा, जब तुम्हारे कानों में मेरी पुकार पहुँचेगी। उस दिन तुम्हें मेरी बात सुननी ही पड़ेगी। भाव यह है कि सुजान की अनदेखी पर कवि चित्कार उठते हैं और उसके सम्मुख यह कहने पर विवश हो उठते हैं कि एक दिन सुजान स्वयं कवि के प्रेम निवेदन को स्वीकार करेगी।
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