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प्रश्न
निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:
"अब बैजू बावरा जवान था और रागविद्या में दिन-ब-दिन आगे बढ़ रहा था। उसके स्वर में जादू था और तान में एक आश्चर्यमयी मोहिनी थी।" गाता था तो पत्थर तक पिघल जाते थे और पशु-पंछी तक मुग्ध हो जाते थे। लोग सुनते थे और झूमते थे तथा वाह-वाह करते थे। हवा रुक जाती थी । एक समाँ बंध जाता था। एक दिन हरिदास ने हँसकर कहा - ''वत्स! मेरे पास जो कुछ था, वह न मैंने तुझे दे डाला। अब तू पूर्ण गंधर्व हो गया है। अब मेरे पास और कुछ नहीं, जो तुझे दूँ।'' बैजू हाथ बाँधकर खड़ा हो गया। कृतज्ञता का भाव आँसुओं के रूप में न बह निकला। चरणों पर सिर रखकर बोला - ''महाराज आपका उपकार जन्म न भर सिर से न उतरेगा।'' हरिदास सिर हिलाकर बोले - ''यह नहीं बेटा! कुछ और कहो। मैं तुम्हारे मुँह से कुछ और सुनना चाहता हूँ।'' बैजू - ''आज्ञा कोजिए।'' हरिदास - ''तुम पहले प्रतिज्ञा करो।'' बैजू ने बिना सोच-विचार किए कह दिया - ''मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि .......'' हरिदास ने वाक्य को पूरा किया - ''इस रागविद्या से किसी को हानि न पहुचाऊँगा।'' |
- कृति पूर्ण कीजिए: (२)
- निम्नलिखित शब्दों के लिंग पहचानकर लिखिए: (२)
- बेटा -
- बस्ती -
- मोहिनी -
- हरिदास -
- 'क्षमा जीवन का मूलमंत्र है' इस विषय पर अपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए। (२)
उत्तर
- बेटा - पुल्लिंग
- बस्ती - स्त्रीलिंग
- मोहिनी - स्त्रीलिंग
- हरिदास - पुल्लिंग
- क्षमा एक महान गुण है जो जीवन में शांति और संतुलन बनाए रखता है। यह न केवल दूसरों को माफ करने की शक्ति देता है, बल्कि मन को भी हल्का करता है। क्षमा से वैर-भाव समाप्त होता है और रिश्तों में मधुरता बनी रहती है। यदि हम दूसरों की गलतियों को माफ करना सीख लें, तो समाज में प्रेम और सद्भाव बना रहेगा। इसलिए, क्षमा को जीवन का मूलमंत्र मानकर अपनाना चाहिए।