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प्रश्न
अपने समाज में उपस्थित स्तरीकरण की व्यवस्था के बारे में आपका क्या प्रेक्षण है? स्तरीकरण से व्यक्तिगत जीवन किस प्रकार प्रभावित होते हैं?
उत्तर
समाजशास्त्र में ‘स्तरीकरण’ शब्द संरचनातीत सामाजिक असमानताओं के अध्ययन के लिए प्रायःप्रयोग किया जाता है, जैसे कि व्यक्तियों के समूहों के मध्य किसी सुव्यवस्थिति असमानताओं का अध्ययन, जो सामाजिक प्रक्रिया एवं संबंधों के अप्रत्याशित परिणाम के रूप में प्रकट होता है। जब हम पूछते हैं कि गरीबी क्यों है, भारत में दलित और महिलाएँ सामाजिक रूप से अपंग क्यों हैं, तो हम सामाजिक स्तरीकरण के विषय में प्रश्न खड़ा करते हैं। सामाजिक स्तरीकरण सूक्ष्म समाजशास्त्र की सारभाग (Core) समस्या है, जोकि समाज का समग्र अध्ययन है। सामाजिक स्तरीकरण का सरोकार अनेक अर्थों में वर्ग और प्रस्थिति की समस्याओं से है-सामाजिक समाकलन (Integration) के समझ की कुंजी के रूप में समूह गठन, जोकि जिस हद तक सामाजिक संबंध संसक्तिशील (Cohesive) है या विभाजनात्मक (Divisive), वह परिणामतः सामाजिक व्यवस्था को निर्धारित करता है।
मैंने प्रेक्षण किया है कि हमारे समाज में स्तरीकरण व्यवस्था संरचना का अस्तित्व, भारतीय समाज के विविध समूहों के मध्य असमानता इत्यादि का द्योतक है। भारतीय समाज में संस्तरण के स्तर पाए जाते हैं, जोकि समाज के शिखर पर उच्चतम योग्य व्यक्ति और धरातल पर निम्नतम योग्य व्यक्ति। भारतीय समाज में आर्थिक विषमता, जिससे वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था इत्यादि का जन्म हुआ, स्तरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- भारतीय जाति स्तरीकरण व्यवस्था में किसी व्यक्ति की प्रस्थिति व्यक्ति की उपलब्धियों एवं उसके योगदान या उसके मनोवैज्ञानिक गुणों से न होकर जन्म से प्रदत्त है।
- भारतीय समाज के इस स्तरीकरण के विरुद्ध कुछ आशाएँ हैं। आर्थिक विकास, संवैधानिक व्यवस्था, नगरीकरण, औद्योगिकीकरण, शिक्षा, सुगम संचार और प्रबुद्ध माध्यम के कारण हमारा समाज खुशहाली की तरफ धीरे-धीरे परिवर्तनशील है।
- स्तरीकरण किसी समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जैसे हम जानते हैं कि समाज एक समूह है और समूह एक संगठित संरचना है, जिसमें सदस्यों की प्रस्थिति भूमिका होती है।
- सामाजिक स्तरीकरण इस बात का आश्वासन देता है कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण पदों पर योग्य व्यक्तियों को होना चाहिए।
- भूमिका का सरोकार उम्मीदों से है, जो गतिशील है और प्रस्थिति का व्यवहारिक क्षेत्र है। प्रस्थिति का संदर्भ समाज में प्रत्येक सदस्य द्वारा धारण स्थिति से है। किसी सदस्य की प्रस्थिति की संस्थापित भूमिका है। प्रस्थिति समाज में व्यवस्थित, मानकीकृत एवं औपचारिक हो जाती है।
- सामाजिक स्तरीकरण सामान्य पूर्वानुमान से प्रारंभ होता है या प्रकार्यवाद के विश्वास पर आधारित है। कि कोई भी समाज वर्गहीन या बिना स्तरीकरण के है। केवल समन्वय, संतुलन, समाकलन तथा सबके विकास की आवश्यकता पड़ती है, जो किसी स्वस्थ समाज का उद्देश्य होना चाहिए।