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समाज के सदस्य के रूप में आप समूहों में और विभिन्न समूहों के साथ अंतःक्रिया करते होंगे। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से इन समूहों को आप किस प्रकार देखते हैं? - Sociology (समाजशास्त्र)

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प्रश्न

समाज के सदस्य के रूप में आप समूहों में और विभिन्न समूहों के साथ अंतःक्रिया करते होंगे। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से इन समूहों को आप किस प्रकार देखते हैं?

थोडक्यात उत्तर

उत्तर

सामाजिक समूह का सरोकार सदस्यों या व्यक्तियों से है, जो सदस्यता के औपचारिक या अनौपचारिक कसौटी द्वारा परिभाषित किए जाते हैं तथा जो एकता के अनुभव का आदान-प्रदान करते हैं या अंत:क्रिया के अपेक्षाकृत स्थिर प्रतिमानों द्वारा एक-दूसरे से बँधे होते हैं। सामाजिक समूह के सदस्य समान विशेषताओं और उद्देश्यों के आधार पर संबंधों को कायम करते हैं। तथा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। सामाजिक समूह को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है कि यह दो या दो से अधिक व्यक्तियों की एक संगठित संरचना है, जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे के साथ अंत:क्रिया करते हैं, समान उद्देश्यों का आदान-प्रदान करते हैं, एक-दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं तथा स्वयं को किसी समूह का सदस्य समझते हैं।

समूह की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ हैं:

  1. एक सामाजिक इकाई, जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति पाए जाते हैं, जो स्वयं को किसी समूह के साथ अपनापन का भाव महसूस करते हैं। समूह की यह विशेषता एक समूह को दूसरे समूह से अंतर करने में मदद करती है तथा समूह को उसकी पहचान प्रदान करती है।
  2. व्यक्तियों का एक समुच्चय, जिसके समान प्रयोजन और उद्देश्य होते हैं। समूह या तो किसी दिए गए उद्देश्य के प्रति कार्य करता है या समूह के समक्ष निश्चित आशंकाओं से दूर हटकर कार्य करता है।
  3. निरंतर व्यवस्था करने के लिए अटल अंत:क्रिया।
  4. अंत:क्रिया का एक स्थिर मानक।
  5. समान प्रतिमानों और संरचनाओं की स्वीकृति।
  6. व्यक्तियों का एक समुच्चय, जो इस तथ्य पर अन्योन्याश्रित है कि कोई क्या कर रहा है, इसका प्रभाव दूसरों पर भी पड़ सकता है।
  7. यह भूमिका, प्रतिमान, प्रस्थिति और संसक्तिशीलता (Cohensiveness) के समुच्चय के माध्यम से एक संगठित संरचना है। समाजशास्त्री, मानव विज्ञानी (Anthropologists) और समाज मनोवैज्ञानिक (Social Psychologists) ने समूह को विभिन्न प्रकार से वर्गीकृत किया है।

प्राथमिक और द्वितीयक समूह:

  1. प्राथमिक समूह पूर्व-स्थित बनावट है, जो व्यक्ति प्रायः प्राप्त करता है, जबकि द्वितीयक समूह वे समूह हैं, जिनसे व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से जुड़ता है। उदाहरण के लिए, परिवार, जाति एवं धर्म प्राथमिक समूह हैं, जबकि किसी राजनीतिक दल की सदस्यता द्वितीयक समूह का उदाहरण है।
  2. प्राथमिक समूह में आमने-सामने की अंत:क्रिया होती है। सदस्यों में भौतिक निकटता पाई जाती है। वे संवेदनशील बंधनों का आदान-प्रदान करते हैं।
  3. प्राथमिक समूह व्यक्तिगत कार्य के केंद्रबिंदु हैं और विकास के प्रारंभिक चरण में व्यक्ति के मूल्यों तथा आदर्शों को विकसित करने में अहम् भूमिका निभाते हैं।
  4. द्वितीयक समूह वे समूह हैं, जहाँ सदस्यों के मध्य संबंधों का स्वरूप अव्यक्तिगत, अप्रत्यक्ष एवं कम तीव्र होता है।
  5. प्राथमिक समूह में सीमाएँ कम पारगम्य होती हैं। इस समूह के सदस्यों के पास सदस्यता चुनने का कोई विकल्प नहीं होता है। जबकि जहाँ द्वितीयक समूह में समूह को छोड़ना तथा अपनाना आसान होता है।
  6. प्राथमिक समूह में अपनापन का भाव पाया जाता है, जबकि द्वितीयक समूह आकार में अपेक्षाकृत बड़े होते हैं। इसलिए इनमें अपनापन न के बराबर होता है। इसकी विशिष्टता औपचारिक और
    अनौपचारिक संबंधों से जानी जाती है। उदाहरण | के लिए विद्यालय, कार्यालय, अस्पताल इत्यादि।     

औपचारिक और अनौपचारिक समूह:

समूह के कार्य औपचारिक समूहों में स्पष्ट एवं औपचारिक रूप से व्यक्त किया गया है। औपचारिक समूहों की बनावट विशिष्ट सिद्धांतों या नियमों पर आधारित है तथा सदस्य की निश्चित भूमिकाएँ हैं। औपचारिक समूह संरचना के आधार पर अनौपचारिक समूह से अलग है। अनौपचारिक समूह अधिक लचीला होता है और सदस्यों के मध्य निकट संबंध पाया जाता है।

अंत:समूह और बाह्य समूह:

‘अंत:समूह’ शब्द का अर्थ है-किसी का अपना समूह और ‘बाह्य-समूह’ शब्द का अर्थ है-दूसरों का समूह।
अंत:समूह के सदस्यों के लिए ‘हम’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, जबकि बाह्य-समूह के सदस्यों के लिए ‘वे’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। अंत:समूह के व्यक्ति प्रायः समान समझे जाते हैं और सकारात्मक दृष्टि से अवलोकन किए जाते हैं तथा उनके वांछनीय चारित्रिक गुण होते हैं। बाह्य समूह के सदस्य भिन्न रूप से अवलोकन किए जाते हैं और अंत:समूह के सदस्यों की तुलना में नकारात्मक समझे जाते हैं।

समवयस्क समूह:

व्यक्तियों का एक समुच्च्य, जो कुछ समान विशेषताओं का आदान-प्रदान करते हैं, जैसे कि आयु, जातीयता या व्यवसाय, स्वयं को एक विशिष्ट सामाजिक जन-समूह समझते हैं और दूसरों के द्वारा स्वीकार किए जाते हैं।

संदर्भ समूह:

‘संदर्भ समूह’ शब्द की खोज हर्बर्ट हायमन (Herbert Hyman) द्वारा की गई थी। हायमन (Hyman) ने सदस्यता समूह, जिसके लोग सदस्य होते हैं और संदर्भ समूह, जिसकी तुलना में प्रयोग किया जाता है, के मध्य अंतर स्थापित किया। संदर्भ समूह एक सदस्यता समूह हो भी सकता है या नहीं भी हो सकता है। हम सभी के अपने सपने और आकांक्षाएँ हैं।

सामाजिक परिदृश्य में हम सभी सामाजिक दुनिया में निवास करते हैं। हम किसी समूह के प्रति मोहित या
आकर्षित हो जाते हैं, जो लगता है कि किसी अधिक सुखद जीवन की ओर अग्रसर है। जब हम अन्य लोगों या समूहों को देखते हैं, तब हमें उनके समान बनने की गुप्त रूप से अभिलाषा करते हैं। हम उनके साथ अपनी पहचान बनानी आरंभ कर देते हैं। हम उनके गुणों को अंतरंग करते हैं। हम उनके स्वभाविक प्रतिमानों तथा क्रियाविधि का भी अंतरंग करते हैं, ताकि हम उनकी तरह लगें। इस प्रकार हम संदर्भ समूह के सदस्य नहीं होते हैं। हम केवल उनको अपनी पहचान बना लेते हैं। न्यूकॉम्ब (Newcomb) एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक थे। उन्होंने उदार महिला महाविद्यालय के छात्रों के बदलते मूल्यों और विचारों की व्याख्या में मदद के लिए संदर्भ समूह का प्रयोग किया। अनेक महिलाएँ जिनका संबंध राजनीतिक तौर पर रूढ़िवादी पृष्ठभूमि से था, ने अपने महाविद्यालय जीवनवृत के पाठ्यक्रमों के प्रति उदार विचार शीघ्रता से विकसित की, क्योंकि उनका लगाव महाविद्यालय प्राध्यापक वर्ग से अधिक और अपनी उत्पत्ति के परिवार से कम था। जिन लड़कियों में सर्वाधिक परिवर्तन हुए, अपने उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सामाजिक संबंधों के संदर्भ में, व्यक्तिगत उपयुक्तता के अर्थ में, उनकी विशिष्टिता उनके माता-पिता से स्वतंत्र थी।

उदाहरण के लिए, अनेक बार विद्यालय और महाविद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियाँ तथा लड़के बॉलीवुड (Bollywood) की प्रशंसा करते हैं, उसको महत्व देते हैं एवं उसके साथ अपनी पहचान व्यक्त करते हैं, जैसे-साधना, राजेश खन्ना इत्यादि व गुप्त रूप से, उनकी तरह बनने की अभिलाषा विकसित करते हैं। वे अपनी जीवन शैली, बाल और बातचीत का ढंग, कपड़े इत्यादि उनकी तरह पहनना प्रारंभ कर देते हैं। प्रधानतः उनकी सदस्यता समूह छात्र समूह है, लेकिन वे फिल्म कलाकार समूह (Film Stars Group) के प्रति मोहित हो जाते हैं, जो उनके लिए संदर्भ समूह हैं। सामाजिक दृष्टिकोण से यदि समाज में संदर्भ समूह के अर्थ में राजनीति, धर्म, व्यवसाय इत्यादि से संबंधित आदर्श पात्र हैं, तो युवा पीढ़ी तदानुसार उनसे प्रभावित होती है।

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सामाजिक समूह एवं समाज
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पाठ 2: समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग - अभ्यास [पृष्ठ ४४]

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एनसीईआरटी Sociology [Hindi] Class 11
पाठ 2 समाजशास्त्र में प्रयुक्त शब्दावली, संकल्पनाएँ एवं उनका उपयोग
अभ्यास | Q 2. | पृष्ठ ४४
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