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प्रश्न
औपनिवेशिक काल के वन प्रबंधन में आए परिवर्तनों ने इन समूहों को कैसे प्रभावित किया:
- झूम खेती करने वालों को
- घुमंतू और चरवाहा समुदायों को
- लकड़ी और वन-उत्पादों का व्यापार करने वाली कंपनियों को
- बागान मालिकों को
- शिकार खेलने वाले राजाओं और अंग्रेज अफसरों को
उत्तर
- झूम खेती करने वालों को बलपूर्वक वनों में उनके घरों से विस्थापित कर दिया गया। उन्हें अपने व्यवसाय बदलने पर मजबूर किया गया जबकि कुछ ने परिवर्तन का विरोध करने के लिए बड़े और छोटे विद्रोहों में भाग लिया।
- उनके दैनिक जीवन पर नए वन कानूनों का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। वन प्रबंधन द्वारा लाए गए बदलावों के कारण नोमड एवं चरवाहा समुदाय के लोग वनों में पशु नहीं चरा सकते थे, कंदमूल व फल एकत्र नहीं कर सकते थे और शिकार तथा मछली नहीं पकड़ सकते थे। यह सब गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था। इसके फलस्वरूप उन्हें लकड़ी चोरी करने को मजबूर होना पड़ता और यदि पकड़े जाते तो उन्हें वन रक्षकों को घूस देनी पड़ती। इनमें से कुछ समुदायों को अपराधी कबीले भी कहा जाता था।
- उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ तक इंग्लैंड में बलूत के वन लुप्त होने लगे थे जिसने शाही नौसेना के लिए लकड़ी की आपूर्ति की किल्लत पैदा कर दी। 1820 तक अंग्रेजी खोजी दस्ते भारत की वन-संपदा का अंवेषण करने के लिए भेजे गए। एक दशक के अंदर बड़ी संख्या में पेड़ों को काट डाला गया और बहुत अधिक मात्रा में लकड़ी का भारत से निर्यात किया गया। व्यापार पूर्णतया सरकारी अधिनियम के अंतर्गत संचालित किया जाता था। ब्रिटिश प्रशासन ने यूरोपीय कंपनियों को विशेष अधिकार दिए कि वे ही कुछ निश्चित क्षेत्रों में वन्य उत्पादों में व्यापार कर सकेंगे। लकड़ी/वन्य उत्पादों का व्यापार करने वाली कुछ कंपनियों के लिए यह फायदेमंद साबित हुआ। वे अपने फायदे के लिए अंधाधुंध वन काटने में लग गए।
- यूरोप में इन वस्तुओं की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए प्राकृतिक वनों के बड़े क्षेत्रों को चाय, कॉफी, रबड़ के बागानों के लिए साफ़ कर दिया गया। औपनिवेशी सरकार ने वनों पर अधिकार कर लिया और इनके बड़े क्षेत्रों को कम कीमत पर यूरोपीय बाग लगाने वालों को दे दिए। इन क्षेत्रों की बाड़बंदी कर दी गई और वनों को साफ़ करके चाय व कॉफी के बाग लगा दिए गए। बागान के मालिकों ने मजदूरों को लंबे समय तक और वह भी कम मजदूरी पर काम करवा कर बहुत लाभ कमाया। नए वन्य कानूनों के कारण मज़दूर इसका विरोध भी नहीं कर सकते थे क्योंकि यही उनकी आजीविका कमाने का एकमात्र जरिया था।
- ब्रिटिश लोग बड़े जानवरों को खतरनाक समझते थे और उनको विश्वास था कि खतरनाक जानवरों को मार कर वे भारत को सभ्य बनाएँगे। वे बाघ, भेड़िये और अन्य बड़े जानवरों को मारने पर यह कह कर इनाम देते थे कि वे किसानों के लिए खतरा थे परिणामस्वरूप खतरनाक जंगली जानवरों के शिकार को प्रोत्साहित किया गया जैसे कि बाघ और भेड़िया आदि।
80,000 बाघ, 1,50,000 तेंदुए और 2,00,000 भेड़िएँ 1875 से 1925 की अवधि के दौरान इनाम के लिए मार डाले गए।
सरगुजा के महाराज ने सन् 1957 तक अकेले ही 1,157 बाघों और 2,000 तेंदुओं का शिकार किया था। एक अंग्रेजी प्रशासक जॉर्ज यूल ने 400 बाघों का शिकार किया।
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