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प्रश्न
क्या आप मानते हैं कि न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका और कार्यपालिका में विरोध पनप सकता है? क्यों?
उत्तर
भारतीय न्यायपालिका को न्यायिक पुनरवलोकन की शक्ति प्राप्त है जिसके आधार पर न्यायपालिका विधायिका द्वारा पारित कानूनों तथा कार्यपालिका द्वारा जारी आदेशों की संवैधानिक वैधता की जाँच कर सकती है, अगर ये संविधान के विपरीत पाए जाते हैं तो न्यायपालिका उन्हें अवैध घोषित कर सकती है। परन्तु न्यायपालिका नीतिगत विषय पर टिप्पणी नहीं कर सकती। विगत कुछ वर्षों में न्यायपालिका ने अपनी इस सीमा को तोड़ा है व कार्यपालिका के कार्यों में निरन्तर हस्तक्षेप व बाधा कर रही है जिसे राजनीतिक क्षेत्रों में न्यायिक सक्रियता कहा जाता है जिसके परिणामस्वरूप कार्यपालिका व न्यायपालिका में टकराव उत्पन्न हो गया है।
न्यायिक सक्रियता कार्यपालिका के क्षेत्र में न्यायपालिका के हस्तक्षेप के कारण न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संघर्ष का कारण बन सकती है। प्रदूषण से संबंधित मुद्दों, भ्रष्टाचार के खिलाफ मामलों की जांच और चुनावी सुधार जो आमतौर पर विधायिका के नियंत्रण में कार्यपालिका द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं, का समाधान न्यायपालिका द्वारा किया जा रहा है। न्यायिक सक्रियता सरकार के प्रत्येक अंग की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र का सम्मान करने के लोकतांत्रिक सिद्धांत का भी उल्लंघन करती है क्योंकि यह न्यायपालिका को असाधारण शक्तियां प्रदान करती है।
ऐसे में सरकार के तीनों अंगों के बीच संतुलन बेहद नाजुक हो गया है.