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प्रश्न
‘नदी और समुद्र’ के बीच होने वाला संवाद अपने शब्दों में लिखिए।
थोडक्यात उत्तर
उत्तर
नदी: | मैं हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके आपके पास आती हूँ। आप मेरा जोश से स्वागत भी नहीं करते। |
समुद्र: | ऐसी निंदा मत करो। मैं तो आपको अपने आप में समाहित कर लेता हूँ। अब इससे ज्यादा स्वागत और क्या हो सकता है? |
नदी: | प्रिय समुद्र, जिस रास्ते से मैं आती हूँ, वह रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़ है। आप तक पहुँचना मेरे लिए कठिन हो जाता हैं। |
समुद्र: | इसमें मैं तुम्हारी क्या मदत कर सकता हूँ? वर्षाऋतु में अपनी तेज गति के कारण तुम अपने साथ जो मिट्टी और पेड़-पौधे लेकर आती हो, उससे मेरी गहराई थोड़ी-बहुत कम हो जाती है। |
नदी: | मैं इसमें क्या कर सकती हूँ। वर्षाऋतु में जब बादल ढेर सारा जल एकसाथ बरसाते हैं, तब मुझमें बाढ़ आ जाती है। यह सही है कि, मेरे इस तीव्रता के कारण मेरे किनारे की फसलें नष्ट हो जाती हैं, घर गिर जाते हैं। मैं भी यह देखकर दुखी होती हूँ। |
समुद्र: | तुम्हारे इस तीव्रता को देखकर मैं बड़ा दुःखी होता हूँ। मुझे पता है कि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। तुम धीरे-धीरे चलकर मुझ तक आओ, इससे लोगों को परेशानी भी नहीं होगी। |
नदी: | वर्षा के बाद मैं शांत हो जाती हूँ। अपने किनारे बसे लोगों के खेतों के लिए जल देती हैँ। पीने का पानी भी उपस्थित कराती हूँ । बाँधों के लिए जल भी मैं ही प्रदान करती हूँ। |
समुद्र: | वैसे तो मुझे जल का भंडार कहा जाता है, लेकिन मेरा जल लोगों के किस काम में आ सकता है? |
नदी: | आपको उदास होने की कोई आवश्यकता नहीं। आपके कारण ही तो बादल बनते हैं। आप ही पुनर्जन्म का साधन प्रदान करते हैं। आपके ही कारण पूरे विश्व को जल प्राप्त होता है। |
समुद्र: | अच्छा, ज्वार का समय हो गया है। अब मैं चलता हूँ। |
नदी: | ठीक है, चलिए, नमस्कार। |
समुद्र: | नमस्कार। |
shaalaa.com
सींकवाली
या प्रश्नात किंवा उत्तरात काही त्रुटी आहे का?
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पर एक दिन की बात, बच्चों ने कुछ ज्यादा ही चिढ़ा दिया, तो ताई अपना गुस्सा काबू नहीं कर पाईं। लाठी लेकर पीछे-पीछे दौड़ पड़ीं। पर अभी कुछ ही आगे गई थीं कि एक गड्ढ़े में उनका पैर पड़ा लाठी दूर जा गिरी और ताई बुरी तरह लड़खड़ाकर जमीन पर आ गिरीं। सिर से खून निकलने लगा। एक पैर भी बुरी तरह मुड़ गया था और ताई हाय-हाय कर रही थीं। उन्होंने खुद उठने की दो-एक बार कोशिश की, पर लाचार थीं। बच्चे दूर से यह देख रहे थे। पर पास आने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। आखिर गोलू और भीमा ने किसी तरह आगे आकर उन्हें सहारा दिया और उन्हें घर के अंदर ले गए। |
संजाल पूर्ण कीजिएः
पर एक दिन की बात, बच्चों ने कुछ ज्यादा ही चिढ़ा दिया, तो ताई अपना गुस्सा काबू नहीं कर पाईं। लाठी लेकर पीछे-पीछे दौड़ पड़ीं। पर अभी कुछ ही आगे गई थीं कि एक गड्ढ़े में उनका पैर पड़ा लाठी दूर जा गिरी और ताई बुरी तरह लड़खड़ाकर जमीन पर आ गिरीं। सिर से खून निकलने लगा। एक पैर भी बुरी तरह मुड़ गया था और ताई हाय-हाय कर रही थीं। उन्होंने खुद उठने की दो-एक बार कोशिश की, पर लाचार थीं। बच्चे दूर से यह देख रहे थे। पर पास आने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। आखिर गोलू और भीमा ने किसी तरह आगे आकर उन्हें सहारा दिया और उन्हें घर के अंदर ले गए। |
उत्तर लिखिए:
‘बच्चे दूर से यह देख रहे थे।’ इस वाक्य से होने वाला बोध
पर एक दिन की बात, बच्चों ने कुछ ज्यादा ही चिढ़ा दिया, तो ताई अपना गुस्सा काबू नहीं कर पाईं। लाठी लेकर पीछे-पीछे दौड़ पड़ीं। पर अभी कुछ ही आगे गई थीं कि एक गड्ढ़े में उनका पैर पड़ा लाठी दूर जा गिरी और ताई बुरी तरह लड़खड़ाकर जमीन पर आ गिरीं। सिर से खून निकलने लगा। एक पैर भी बुरी तरह मुड़ गया था और ताई हाय-हाय कर रही थीं। उन्होंने खुद उठने की दो-एक बार कोशिश की, पर लाचार थीं। बच्चे दूर से यह देख रहे थे। पर पास आने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। आखिर गोलू और भीमा ने किसी तरह आगे आकर उन्हें सहारा दिया और उन्हें घर के अंदर ले गए। |
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