संदर्भ:
यह काव्यांश प्रसिद्ध मैथिली कवि विद्यापति की एक प्रेमकविता से लिया गया है। विद्यापति की रचनाएँ प्रेम और भक्ति के गहन अनुभवों से भरी हैं। उन्होंने अपने काव्य में प्रेम की सूक्ष्म भावनाओं को बड़े ही सुंदर ढंग से व्यक्त किया है।
प्रसंग:
इस काव्यांश में प्रेम की गहनता, अनुभूति, और उसकी अपर्याप्तता का चित्रण किया गया है। कवि प्रेम के अनुभव को बताने में असमर्थता व्यक्त करते हैं और बताते हैं कि प्रेम का यह अनुभव इतना विशाल है कि इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह प्रेम जन्म-जन्मांतर तक नया बना रहता है और आत्मा को पूर्ण तृप्ति नहीं देता।
व्याख्या:
नायिका अपने प्रेम के अनुभव को सखी से साझा करती है। सखी उत्सुकता से उसके प्रेम की अनुभूति के बारे में जानना चाहती है। नायिका कहती है कि प्रेम का अनुभव हर क्षण नया होता है और इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वह जीवनभर प्रिय को देखती रही, फिर भी उसकी आँखें तृप्त नहीं हुईं। प्रिय की मधुर वाणी सुनने के बावजूद उसके कान संतुष्ट नहीं हुए। कई मिलन-रात्रियाँ बिताने के बाद भी वह प्रेम की गहराई को नहीं समझ पाई। लाखों युगों तक प्रिय को हृदय में रखने के बाद भी प्रेम की जलन खत्म नहीं हुई। विद्यापति कहते हैं कि प्राणों को पूरी तरह संतुष्ट करने वाला अनुभव लाखों में भी एक नहीं मिलता।
विशेष:
- कवि ने प्रेम की भावना को एक व्यक्तिगत अनुभव के रूप में वर्णित किया है जो अलौकिक, अवर्णनीय है, और जिसे अकेले अनुभव किया जा सकता हैं।
- अतिशयोक्ति, इच्छा, विरोधाभास, अनुप्रास और अनूठी अभिव्यक्ति भाषण के अलंकार हैं।
- प्रेम की भावना का बहुत अच्छा वर्णन किया गया है।
- मधुर भाषा का प्रयोग मधुरता के साथ किया गया है।
- गेयता का गुण विद्यमान है।
- मधुरता का गुण उपस्थित है।
- निरूपण ने कथन को सरलता और मधुरता प्रदान की है।
- स्वरों का सद्भाव उपस्थित है।