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प्रश्न
निम्नलिखित प्रश्न के उत्तर लगभग ८० से १०० शब्दों में लिखिए:
‘सुनो किशोरी’ पाठ के आधार पर रूढ़ि-परंपरा तथा मूल्यों के बारे में लेखिका के विचार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
‘सुनो किशोरी’ इस पाठ में लेखिका ने रूढ़ि-परंपरा तथा मूल्यों के संदर्भ में आपने विचार स्पष्ट करते हुए बताया हैं कि बदलते वक्त के साथ बदलते समय के नए मूल्यों को पहचानकर ही उसे स्वीकार करना है नहीं तो लाभ के बजाय हानि उठानी पड़ सकती है। लेखिका के मतानुसार पश्चिमी दुनिया का प्रत्येक मूल्य हमारे लिए नए मूल्य का पर्याय नहीं हो सकता। हमारे पुराने मूल्य अब इतने टूट-फूट गए हैं कि उन्हें जैसे-तैसे जोड़कर खड़ा करने का अर्थ है, अपने आधार को कमजोर करना। समय के साथ अपना अर्थ है, खो चुकी या वर्तमान प्रगतिशील समाज को पीछे ले जाने वाली समाज की कोई भी रीति-नीति रूढ़ि। रूढ़ि स्थिर होती है। जबकि परंपरा समय के साथ अनुपयोगी हो गए मूल्यों को छोड़ती और उपयोगी मूल्यों को जोड़ती निरंतर बहती धारा है। परंपरा गतिशील है। एक निरंतर बहता निर्मल प्रवाह, जो हर सड़ी-गली रूढ़ि को किनारे फेंकता और हर भीतरी-बाहरी, देशी-विदेशी उपयोगी मूल्य को अपने में समेटता चलता है।
इस प्रकार ‘सुनो किशोरी’ इस पाठ में लेखिका ने रूढ़ि-परंपरा तथा मूल्यों के संदर्भ में अपने विचार स्पष्ट किए हैं।
संबंधित प्रश्न
अंतर स्पष्ट कीजिए:-
अ.क्र. | रूढ़ि | परंपरा |
१. | ______ | ______ |
२. | ______ | ______ |
कारण लिखिए:-
सुगंधा का पत्र पाकर लेखिका को खुशी हुई
कारण लिखिए:-
पश्चिमी मूल्य रूपी फल हमारे किसी काम के नहीं होंगे
‘विद्यार्थी जीवन में मित्रता का महत्त्व’, इस विषय पर अपना मंतव्य लिखिए ।
'युवा पीढ़ी किस ओर', इस विषय पर अपने विचार लिखिए।
निम्नलिखित प्रश्न का मात्र एक वाक्य में उत्तर लिखिए्:
आशारानी व्होरा जी के लेखन कार्य का उद्देश्य क्या है?
आशारानी व्होरा जी की रचनाएँ लिखिए।
‘उड़ो बेटी, उड़ो! पर धरती पर निगाह रखकर’, इस पंक्ति में निहित सुगंधा की माँ के विचार स्पष्ट कीजिए।
निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:
बदले वक्त के साथ बदलते समय के नये मूल्यों को भी पहचानकर हमें अपनाना है पर यहाँ ‘पहचान’ शब्द को रेखांकित करो। बिना समझे, बिना पहचाने कुछ भी नया अपनाने से लाभ के बजाय हानि उठानी पड़ सकती है। पश्चिमी दुनिया का हर मूल्य हमारे लिए नये मूल्य का पर्याय नहीं हो सकता। हमारे बहुत-से पुराने मूल्य अब इतने टूट-फूट गए हैं कि उन्हें भी जैसे-तैसे जोड़कर खड़ा करने का मतलब होगा, अपने आधार को कमजोर करना। या यूँ भी कह सकते हैं कि अपनी अच्छी परंपराओं को रूढ़ि में ढालना। समय के साथ अपना अर्थ खो चुकी या वर्तमान प्रगतिशील समाज को पीछे ले जाने वाली समाज की कोई भी रीति-नीति रूढ़ि है, समय के साथ अनुपयोगी हो गए मूल्यों को छोड़ती और उपयोगी मूल्यों को जोड़ती निरंतर बहती धारा परंपरा है, जो रूढ़ि की तरह स्थिर नहीं हो सकती। यही अंतर है दोनों में। रूढ़ि स्थिर है, परंपरा निरंतर गतिशील। एक निरंतर बहता निर्मल प्रवाह, जो हर सड़ी-गली रूढ़ि को किनारे फेंकता और हर भीतरी-बाहरी, देशी-विदेशी उपयोगी मूल्य को अपने में समेटता चलता है। इसीलिए मैंने पहले कहा है कि अपने टूटे-फूटे मूल्यों को भरसक जोड़कर खड़ा करने से कोई लाभ नहीं, आज नहीं तो कल, वे जर्जर मूल्य भरहराकर गिरेंगे ही। |
(१) कारण लिखिए: (२)
- बदले वक्त के साथ नए मूल्यों को पहचानकर हमें अपनाना है
- अपने टूटे-फूटे मूल्यों को भरसक जोड़कर खड़ा करने से कोई नहीं है
(२) उपर्युक्त गद्यांश में प्रयुक्त शब्द-युग्म ढूँढ़कर लिखिए: (२)
(१) | |
(२) | |
(३) | |
(४) |
(३) ‘बदलते समय के साथ हमारे मूल्यों में भी परिवर्तन आवश्यक है’ इस विषय पर अपना मत ४० से ५० शब्दों में स्पष्ट कीजिए। (२)
निम्नलिखित पठित परिच्छेद पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसारकृतियाँ कीजिए:
तुम अपनी सहेली रचना को यह समझाओ कि क्रांति की बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है, कोई छोटी-सी क्रांति भी कर दिखाना कठिन है और एक ही झटके में यूँ टूट-हारकर बैठ जाना तो निहायत मूर्खता है। फिर अभी तो वह प्रथम वर्ष के पूर्वार्ध में ही है। अभी से उसे ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। जरूरी हो तो सोच-समझकर वे अपनी दोस्ती को आगे बढ़ा सकते हैं। कॉलेज जीवन की पूरी अवधि में वे निकट मित्रों की तरह रहकर एक-दूसरे को देखें-जानें, जाँचें-परखें। एक-दूसरे की राह का रोड़ा नहीं, प्रेरणा और ताकत बनकर परस्पर विकास में सहभागी बनें। फिर अपनी पढ़ाई की समाप्ति पर भी यदि वे एक-दूसरे के साथ पूर्ववत लगाव महसूस करें, उन्हें लगे कि निकट रहकर सामने आईं कमियों-गलतियों ने भी उनकी दोस्ती में कोई दरार नहीं डाली है, तो वे एक-दूसरे को उनकी समस्त खूबियों-कमियों के साथ स्वीकार कर अपना लें। उस स्थिति में की गई यह कथित क्रांति न कठिन होगी, न असफल। मेरी राय में रचना को और उसके दोस्त को तब तक धैर्य से प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस बीच वे पूरे जतन के साथ एक-दूसरे के लिए स्वयं को तैयार करें। बिना तैयारी के जल्दबाजी में, पढ़ाई के बीच शादी का निर्णय लेना केवल बेवकूफी ही कही जा सकती है, क्रांति नहीं। ऐसी कथित क्रांति का असफल होना निश्चित ही समझना चाहिए। इतनी जल्दबाजी में तो किसी छोटे-से काम के लिए उठाया कोई छोटा कदम भी शायद ही सफल हो। यह तो जिंदगी का अहम फैसला है। |
1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए: (2)
- कठिन क्या है ?
- एक ही झटके में यूँ टूट-हारकर बैठ जाना क्या है ?
- एक-दूसरे को वे कब निकट मित्रों की तरह रहकर देखे जाँचे परखे?
- बिना तैयारी के जल्दबाजी में शादी का निर्णय क्या कहा जाता है?
2. निम्नलिखित शब्दों के लिंग पहचानकर लिखिए: (2)
- क्रांति
- हस्तक्षेप
- प्रेरणा
- लगाव
3. निम्नलिखित प्रश्न के उत्तर 40 से 50 शब्दों में लिखिए। (2)
विद्यार्थी जीवन में मित्रता का 'महत्त्व' इस विषय पर अपना मत व्यक्त कीजिए।
'सुनो किशोरी' - यह पाठ कौनसी शैली में लिखा गया है?
निम्नलिखित पठित परिच्छेद पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
सुनो सुगंधा ! तुम्हारा पत्र पाकर खुशी हुई। तुमने दोतरफा अधिकार की बात उठाई है, वह पसंद आई। बेशक, जहाँजिस बात से तुम्हारी असहमति हो; वहाँतुम्हें अपनी बात मुझे समझाने का पूरा अधिकार है। मुझे खुशी ही होगी तुम्हारे इस अधिकार प्रयोग पर। इससे राह खुलेगी और खुलती ही जाएगी । जहाँ कहीं कुछ रुकती दिखाई देगी; वहाँ भी परस्पर आदान-प्रदान से राह निकाल ली जाएगी। अपनी-अपनी बात कहने-सुनने में बंधन या संकोच कैसा? मैंने तो अधिकार की बात यों पूछी थी कि मैं उस बेटी की माँ हूँ जो जीवन में ऊँचा उठने के लिए बड़े ऊँचे सपने देखा करती है; आकाश में अपने छोटे-छोटे डैनों को चौड़े फैलाकर। धरती से बहुत ऊँचाई में फैले इन डैनों को यथार्थ से दूर समझकर भी मैं काटना नहीं चाहती। केवल उनकी डोर मजबूत करना चाहती हूँकि अपनी किसी ऊँची उड़ान में वे लड़खड़ा न जाएँ। इसलिए कहना चाहती हूँकि ‘उड़ो बेटी, उड़ो, पर धरती पर निगाह रखकर।’ कहीं ऐसा न हो कि धरती से जुड़ी डोर कट जाए और किसी अनजाने-अवांछित स्थल पर गिरकर डैने क्षत-विक्षत हो जाएँ। ऐसा नहीं होगा क्योंकि तुम एक समझदार लड़की हो। फिर भी सावधानी तो अपेक्षित है ही। यह सावधानी का ही संकेत है कि निगाह धरती पर रखकर उड़ान भरी जाए। उस धरती पर जो तुम्हारा आधार है- उसमें तुम्हारे परिवेश का, तुम्हारे संस्कार का, तुम्हारी सांस्कृतिक परंपरा का, तुम्हारी सामर्थ्य का भी आधार जुड़ा होना चाहिए। हमें पुरानी-जर्जर रूढ़ियों को तोड़ना है, अच्छी परंपराओं को नहीं। परंपरा और रूढ़ि का अर्थ समझती हो न तुम? नहीं ! तो इस अंतर को समझने के लिए अपने सांस्कृतिक आधार से संबंधित साहित्य अपने कॉलेज पुस्तकालय से खोजकर लाना, उसे जरूर पढ़ना। यह आधार एक भारतीय लड़की के नाते तुम्हारे व्यक्तित्व का अटूट हिस्सा है, इसलिए। बदले वक्त के साथ बदलते समय के नये मूल्यों को भी पहचानकर हमें अपनाना है पर यहाँ ‘पहचान’ शब्द को रेखांकित करो। बिना समझे, बिना पहचाने कुछ भी नया अपनाने से लाभ के बजाय हानि उठानी पड़ सकती है। |
1. निम्नलिखित प्रश्न के उत्तर लिखिए। (2)
- लेखिका को खुशी कब हुई?
- हमें पुरानी रूढ़ियों को क्यों तोड़ना है?
- लेखिका किस बेटी की माँ है?
- लेखिका अपनी बेटी के ऊँचाई में फैलें डैनों कीं डोर मजबूत क्यों करना चाहती हैं?
2. शब्द युग्म को पूर्ण कीजिए: (2)
- पुरानी
- क्षत
- कहने
- आदान
3. निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर 40 से 50 शब्दों में लिखिए। (2)
“पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण समाज के लिए हानिप्रद है” इस विषय पर अपना विचार स्पष्ट कीजिए।
निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:
सुनो सुगंधा! तुम्हारा पत्र पाकर खुशी हुई। तुमने दोतरफा अधिकार की बात उठाई है, वह पसंद आई। बेशक, जहाँ जिस बात से तुम्हारी असहमति हो; वहाँ तुम्हें अपनी बात मुझे समझाने का पूरा अधिकार है। मुझे खुशी ही होगी तुम्हारे इस अधिकार प्रयोग पर। इससे राह खुलेगी और खुलती ही जाएगी। जहाँ कहीं कुछ रुकती दिखाई देगी; वहाँ भी परस्पर आदान-प्रदान से राह निकाल ली जाएगी। अपनी-अपनी बात कहने-सुनने में बंधन या संकोच कैसा? मैंने तो अधिकार की बात यों पूछी थी कि मैं उस बेटी की माँ हूँ जो जीवन में ऊँचा उठने के लिए बड़े ऊँचे सपने देखा करती है; आकाश में अपने छोटे-छोटे डैनों को चौड़े फैलाकर। धरती से बहुत ऊँचाई में फैले इन डैनों को यथार्थ से दूर समझकर भी मैं काटना नहीं चाहती। केवल उनकी डोर मजबूत करना चाहती हूँ कि अपनी किसी ऊँची उड़ान में वे लड़खड़ा न जाएँ। इसलिए कहना चाहती हूँ कि ‘उड़ो बेटी, उड़ो, पर धरती पर निगाह रखकर।’ कहीं ऐसा न हो कि धरती से जुड़ी डोर कट जाए और किसी अनजाने-अवांछित स्थल पर गिरकर डैने क्षत-विक्षत हो जाएँ। ऐसा नहीं होगा क्योंकि तुम एक समझदार लड़की हो। फिर भी सावधानी तो अपेक्षित है ही। यह सावधानी का ही संकेत है कि निगाह धरती पर रखकर उड़ान भरी जाए। उस धरती पर जो तुम्हारा आधार है- उसमें तुम्हारे परिवेश का, तुम्हारे संस्कार का, तुम्हारी सांस्कृतिक परंपरा का, तुम्हारी सामर्थ्य का भी आधार जुड़ा होना चाहिए। हमें पुरानी-जर्जर रूढ़ियों को तोड़ना है, अच्छी परंपराओं को नहीं। |
(१) आकृति पूर्ण कीजिए: (२)
(२) निम्नलिखित शब्दों के लिए गद्यांश में आए हुए समानार्थी शब्द ढूँढ़कर लिखिए: (२)
- आनंद -
- नभ -
- पुत्री -
- सजगता -
(३) ‘वर्तमान पीढ़ी के युवक-युवतियों का जीवन के प्रति बदला दृष्टिकोण’ इस विषय पर अपने विचार ४० से ३० शब्दों में स्पष्ट लिखिए। (२)