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तिरती है समीर-सागर परअस्थिर सुख पर दुख की छाया-जग के दग्ध हृदय परनिर्दय विप्लव की प्लावित माया- - Hindi (Core)

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प्रश्न

तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया-

थोडक्यात उत्तर

उत्तर

व्याख्या- कवि बादलों को संबोधित करते हुए कहता है कि इस समीर रूपी सागर में तू तैरता है। अर्थात लोगों की इच्छा से युक्त उनकी नाव हवा रूपी सागर में तैरती है। संसार में व्याप्त सुख सदैव साथ नहीं रहते हैं। इसी कारण इन्हें अस्थिर कहा गया है अर्थात जो स्थिर न रहें। इन पर दुख की छाया हमेशा मंडराती रहती है। संसार के लोगों का हृदय दुखों के कारण दग्ध है। ऐसे हृदय पर क्रांति रूपी माया विद्यमान है। हे बादल! तुम आओ और इस दुखी हृदय वाले संसार को अपनी क्रांति रूपी गर्जना से आनंद प्रदान करो। अर्थात जैसे वर्षाकाल में बादलों की गर्जना सुनकर गर्मी से बेहाल लोगों को खुशी प्रदान होती है, वैसे ही शोषण तथा अत्याचार से परेशान लोगों को क्रांति से खुशी प्राप्त होती है।

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बादल राग
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पाठ 7: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (बादल राग) - अभ्यास [पृष्ठ ४३]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Hindi - Aaroh Class 12
पाठ 7 सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (बादल राग)
अभ्यास | Q 1. | पृष्ठ ४३

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