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प्रश्न
"विदेश नीति का निर्धारण घरेलू जरूरत और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव में होता है।" 1960 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई विदेश निति से एक उदाहरण देते हुए अपने उत्तर की पुष्टि करें।
उत्तर
प्रत्येक देश अपनी विदेश निति का निर्धारण राष्ट्रीय जरूरतों और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दोहरे दबाव के अंतर्गत करता है। इसमें शक नहीं की राष्ट्रीय जरूरतों अथवा हितों को प्रत्येक देश प्राथमिकता देता है, उसे सर्वोपरि मानता है परन्तु केवल राष्ट्रीय जरूरत ही विदेश निति के निर्माण का एकमात्र आधार नहीं होता। प्रत्येक देश भी व्यक्ति की तरह अकेला नहीं रहा सकता, उसे अन्य देशों के साथ संबंध बनाकर चलना पड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ प्रत्येक देश की विदेश निति को प्रभावित करती हैं, उनकी किसी देश द्वारा अनदेखी नहीं की जा सकती। जब भारत स्वतंत्र हुआ और इसने अपनी विदेश निति का निर्धारण किया तो भारत के सामने इसकी सबसे बड़ी राष्ट्रिय जरूरत सामाजिक - आर्थिक विकास की थी और विश्व की परिस्थितियाँ ऐसी थीं की उसने सारे संसार को दो महाशक्तियों की टक्कर में इसे भी चोट पहुँचने की संभावना रहती। अतः भारत ने दोनों गुटों से मित्रता की निति अपनाई ताकि वाहा आक्रमण का खतरा न बने और वह अपने सामाजिक - आर्थिक विकास की ओर ध्यान दे सके। भारत पर 1942 में चीन का आक्रमण हुआ और इस समय सोवियत संघ ने तटस्थता दिखाई। पहले भारत सोवियत संघ पर अधिक निर्भर था क्योंकि कश्मीर के मामले में सोवियत संघ ने ही उसकी सहायता की थी। 1962 में हुए चीन के आक्रमण के समय भारत को अपनी सुरक्षानीति, उत्तर - पूर्व के क्षेत्रो के प्रति अपनी निति, सैनिक ढांचे के आधुनिकरण आदि के बारे में फिर से विचार करना पड़ा और अपने रक्षा व्यय में वृद्धि करनी पड़ी।
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इस बयान के आगे सही या गलत का निशान लगाएँ:
१९७१ की शांति और मैत्री की संधि संयुक्त राज्य अमरीका से भारत की निकटता का परिणाम थी।
भारत की विदेश निति का निर्माण शांति और सहयोग के सिद्धांतों को आधार मानकर हुआ। लेकिन, 1962 - 1972 की अवधि यानी महज दस सालों में भारत को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा। क्या आपको लगता है की यह भारत की विदेश निति की असफलता है अथवा, आप इसे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम मानेंगे? अपने मंतव्य के पक्ष में तर्क दीजिए।