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प्रश्न
नेहरू विदेश निति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक क्यों मानते थे? अपने उत्तर में दो कारण बताएँ और उनके पक्ष में उदाहरण भी दें।
उत्तर
नेहरू निति के संचालन को स्वतंत्रता का एक अनिवार्य संकेतक मानते थे। नेहरू जी ही नहीं कांग्रेस के सभी नेता इस बात के समर्थक थे। जब 1939 में दूसरा युद्ध आरंभ हुआ तो ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से सलाह या बात किए बिना भारत के युद्ध में सम्मिलित होने की घोषणा कर दी। उस समय तो भारत स्वतंत्र नहीं था। उस समय भी कांग्रेस ने यह माँग की भारत के युद्ध में सम्मिलित होने की घोषणा किए जाने से पहले भारतीय नेताओं से बात - चित की जानी आवश्यक थी। इसके विरोध स्वरूप कंग्रेस ने सभी प्रांतों की मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र दे दिए थे। विदेश निति के स्वतंत्र निर्धारण तथा संचालन को नेहरू जी द्वारा स्वतंत्रता का अनिवार्य संकेतक समझे जाने के कई कारण निम्नलिखित है-
- जो देश किसी दूसरे देश के दबाव में आकर अपनी विदेश निति का निर्धारण और संचालन करता है तो उसकी स्वतंत्रता निरर्थक होती है और वह एक प्रकार से उस दूसरे देश के अधीन ही हो जाता है तथा ऐसी अवस्था में उसे कई बार अपने राष्ट्रिय हितों की भी अनदेखी करनी पड़ती है। यह दूसरे देश की हाँ में हाँ और न में न मिलाने वाली एक मशीन बनकर रह जाता है। नेहरू जी ने 1947 में भारत में हुए एशिआई संबंध सम्मेलन में यह बात स्पष्ट रूप से कहि थी की भारत स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपनी स्वतंत्र विदेश निति के आधार पर सभी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में पूर्ण रूप से भाग लेगा, किसी महाशक्ति अथवा किसी दूसरी देश के दबाव में नहीं।
- नेहरू जी का विचार था की किसी स्वतंत्र राष्ट्र में यदि अपनी विदेश निति का संचालन स्वतंत्रतापूर्णक नहीं कर सकता तो उसमे स्वाभिमान, आत्मसम्मान की भावना विकसित नहीं होती, वह विश्व समुदाय में सर ऊँचा उठाकर नहीं चल सकता और राष्ट्र का नैतिक विकास नहीं हो पाता। उसकी स्वतंत्रता नाममात्र होती है। बांडुंग सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा था की यह बड़ी अपमानजनक तथा असहाय बात है की कोई एशियाई - अफ्रीकी देश महाशक्तियों के गुटों में से किसी गुट का दुमछल्ला बनकर जिए। हमें गुटों के आपसी झगड़ों से अलग रहना चाहिए और स्वतंत्रतापूर्णक अपनी विदेश निति का निर्माण तथा संचालन करना चाहिए।
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अपने पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध शुरुआत से ही तनावपूर्ण रहे।
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(ख) | पंचशील | (ii) | क्षेत्रीय अंखडता और संप्रभुता की रक्षा तथा आर्थिक विकास। |
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- जवाहरलाल नेहरू
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