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व्यक्तित्व के मानवतावादी उपागम की प्रमुख प्रतिग्यप्ति क्या है? आत्मसिद्धि से मैस्लो का क्या तात्पर्य था? - Psychology (मनोविज्ञान)

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प्रश्न

व्यक्तित्व के मानवतावादी उपागम की प्रमुख प्रतिग्यप्ति क्या है? आत्मसिद्धि से मैस्लो का क्या तात्पर्य था?

दीर्घउत्तर

उत्तर

मानवतावादी सिद्धांत मुख्यत: फ्रायड के सिद्धंत के प्रत्युत्तर में विकसित हुए व्यक्तितत्व के संदर्भ में मानवतावादी परिपेक्ष के विकास में कार्ल रोजर्स और अब्रह्म मैस्लो ने विशेष रूप से योगदान किया है रोजर्स द्वारा प्रस्तविक सर्वधिक महत्वपूर्ण विचार एक पूर्णत प्रकायर्शील व्यक्ति का है उनका विश्वास है की व्यक्तित्व के विकास के लिए संतुष्टि अभिप्रेरक शक्ति है लोग अपनी क्षमताओं संभ्वयताओ और प्रतिभाओ को संभव सवत्कॄष्ट तरीके से अभिव्यक्ति करने के लिए निदिर्ष्ट करती है मानव व्यवहार के बारे रोजर्स ने दो आधरभूत अभिग्रह निमित किया है एक यह की व्यवहार लक्षोमुख और सार्थक होता है और दूसरा यह की लोग जो की सहज रूप से अच्छे होते है सदैव अनुकूली तथा आत्मसिद्धि वाले में व्यवहार चयन करेंगे

रोजर्स का सिद्धांत उनके निदानशाला में रोगियों को सुनते हुए प्राप्त अनुभवों से विकसित हुआ है। उन्होंने यह ध्यान दिया की उनके सेवार्थियों के अनुभव में आत्म एक महत्त्वपूर्ण तत्व था। इस प्रकार, उनका सिद्धांत आत्म के संप्रत्यय के चतुर्दिक संरचित है। उनके सिद्धांत का अभिग्रह है की लोग सतत अपने वास्तविक आत्म की सिद्धि या प्राप्ति की प्रक्रिया में लगे रहते हैं।

रोजर्स ने सुझाव दिया है की प्रत्येक व्यक्ति के पास आदर्श अंह या आत्म का एक संप्रत्यय होता है। एक आदर्श आत्म होता है जो की एक व्यक्ति बनना अथवा होना चाहता है। जब वास्तविक आत्म और आदर्श आत्म के बिच समरूपता होती है तो व्यक्ति सामान्यतया प्रसन रहता है किन्तु दोनों प्रकार के आत्म के बिच विसंगति के कारण प्रायः अप्रसन्ता और असंतोष की भावनाएँ उत्पत्र होती है। रोजर्स का एक आधारभूत सिद्धांत है की लोगो में आत्मसिद्धि के माध्यम से आत्म - संप्रत्यय को अधिकतम सिमा तक विकसित करने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रक्रिया में आत्म विकसित, विस्तारित और अधिक सामाजिक हो जाता है।

रोजर्स व्यक्तित्व - विकास को एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। इसमें अपने आपको मूल्यांकन करने का अधिगम और आत्मसिद्धि की प्रक्रिया में प्रवीणता सत्रिहित होती है। आत्म - संप्रत्यय के विकास में सामाजिक प्रभवों की भूमिका को उन्होंने स्वीकार किया है। जब सामाजिक दशाएं अनुकूल होती हैं, तब आत्म - संप्रत्यय और आत्म - सम्मान उच्च होता है। इसके विपरीत, जब सामाजिक दशाएं प्रतिकूल होती हैं तब आत्म - संप्रत्यय और आत्म - सम्मान निम्र होता है। उच्च आत्म - संप्रत्यय और उच्च आत्म - सम्मान रखने वाले लोग सामान्यता नम्य एवं नए अनुभवों के प्रति मुक्त भाव से ग्रहणशील होते हैं ताकि वे अपने सतत विकास और आत्मसिद्धि में लगे रह सकें।

मैस्लो ने आत्मसिद्धि की लब्धि या प्राप्ति के रूप में मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ लोगों की एक विस्तृत व्याख्या दी है। आत्मसिद्धि वह अवस्था होती है जिसमें लोग अपनी संपूर्ण संभाव्यताओं को विकसित कर चुके होते हैं। मैस्लो ने मनुष्यों का एक आशावादी और सकारात्मक द्द्ष्टिकोण विकासित किया है जिसके अंतर्गत मानव में प्रेम, हर्ष और सृजनात्मक कार्यो को करने में स्वतंत्र माने गए हैं। अभिप्रेरणाओं, जो हमारे जीवन को नियमित करती है के विश्लेषण के द्वारा आत्मसिद्धि को संभव बनाया जा सकता है। हम जानते है की जैविक, सुरक्षा और आत्मीयता की आवश्यकताएं (उत्तरजीवित आवश्यकताए) पशुओं और मनुष्यों दोनों में पाई जाती हैं। अतएव किसी व्यक्ति का मात्र इन आवश्यकताओं की संतुष्टि में संलग्र होना उसे पशुओं के स्तर पर ले आता है। मानव जीवन की वास्तविक यात्रा आत्म - सम्मान और आत्मसिद्धि जैसी आवश्यकताओ के अनुसरण से आरंभ होती है। मानवतावादी उपागम जीवन के सकारात्मक पक्षों के महत्व पर बल देता है।

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व्यक्तित्व के अध्ययन के प्रमुख उपागम
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पाठ 2: आत्म एवं व्यक्तित्व - समीक्षात्मक प्रश्न [पृष्ठ ५२]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Psychology [Hindi] Class 12
पाठ 2 आत्म एवं व्यक्तित्व
समीक्षात्मक प्रश्न | Q 7. | पृष्ठ ५२
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