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Question
'जनजातीय समुदायों को कैसे जोड़ा जाए’-इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?
Solution
- अनेक ब्रिटिश प्रशासक ऐसे भी थे जो मानवविज्ञानी थे। वे भारतीय जनजातियों में रुचि रखते थे। उनका विश्वास था कि ये आदिम लोग थे और उनकी अपनी विशिष्ट संस्कृति थी। साथ ही ये भारतीय जनजातियाँ हिंदू मुख्यधारा से काफ़ी अलग थीं।
- उनका मत था कि समाज में इन सीधे-सादे जनजातीय लोगों का न केवल शोषण होगा बल्कि उनकी संस्कृति का पतन भी होगा।
- उन्होंने महसूस किया कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वे इन जनजातियों को संरक्षण दे ताकि वे अपनी जीवन विधि और संस्कृति को कायम रख सके। इसका कारण भी था, यह कि उन पर लगातार दबाव बन रहा था कि वे हिंदू संस्कृति की मुख्यधारा में अपना समायोजन करें।
- उनका मानना था कि जनजातीय संस्कृति को बचाने का कार्य गुमराह करने की कोशिश की और इसको परिणाम जनजातियों का पिछड़ापन है।
- घूर्ये राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने इस तथ्य पर बल दिया कि भारतीय जनजातियों को एक भिन्न सांस्कृतिक समूह की तुलना में पिछड़े हिंदू समाज’ की तरह पहचाना जाना चाहिए।
अंतर के मुख्य बिंदु (Main Points of Difference) - मतभेद यह था कि मुख्यधारा की संस्कृति के प्रभाव का किस प्रकार मूल्याकंन किया जाए। संरक्षणवादियों का विश्वास था कि समायोजन को परिणाम जनजातियों के शोषण और उनकी सांस्कृतिक विलुप्तता का रूप सामने आएगा।
- घूयें और राष्ट्रवादियों का तर्क था कि ये दुष्परिणाम केवल जनजातीय संस्कृति तक ही सीमित नहीं हैं। बल्कि भारतीय समाज के सभी पिछड़े और दलित वर्गों में समान रूप से देखे जा सकते हैं।
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