English

ज्ञानेंन्द्रियों की प्रकार्यात्मक सीमाओं की व्याख्या कीजिए। - Psychology (मनोविज्ञान)

Advertisements
Advertisements

Question

ज्ञानेंन्द्रियों की प्रकार्यात्मक सीमाओं की व्याख्या कीजिए।

Long Answer

Solution

मानव ज्ञानेंन्द्रियाँ कुछ सीमा तक कार्य करती हैं। उदाहरण के लिए, हमारी आँखें ऐसी चीजें नहीं देख पाती हैं जो अधिक धुंधली अथवा बहुत दूयुतिमान होती हैं। इसी प्रकार हमारे कान बहुत धीमी अथवा बहुत तीव्र ध्वनि नहीं सुन सकते हैं। यही बात अन्य ज्ञानेंन्द्रियों के विषय में भी लागू होती है। मानव के रूप में हम उद्दीपन के एक सीमित सीमा-प्रसार में कार्य करते हैं। हमारे संवेदन ग्राही के ध्यान में आने के लिए उद्दीपक में दृष्टतम तीव्रता अथवा परिमाण होना चाहिए। उद्दीपक एवं उनकी संवेदनाओं के मध्य संबंधों का अध्ययन जिस विद्याशाखा में किया जाता है, उसे मनोभौतिकी (psychophysics) कहते हैं।

ध्यान में आने के लिए उद्दीपक का एक न्यूनतम मान अथवा वजन होना चाहिए। किसी विशेष संवेदी तंत्र को क्रियाशील करने के लिए जो न्यूनतम मूल्य अपेक्षित होता है उसे निरपेक्ष सीमा अथवा निरपेक्ष देहरी (Absolute threshold or absolute limen, AL) कहते हैं। उदाहरण के लिए, यदि हम पानी के एक गिलास में चीनी का एक कण डालें तो हो सकता है कि हमें उस पानी में मिठास का अनुभव न हो। एक कण और मिलाने से भी हो सकता है कि स्वाद मीठा न हो लेकिन यदि हम एक- एक कण डालते जाएँ तो एक बिंदु ऐसा आएगा जब कहना होगा कि पानी अब मीठा हो गया है। चीनी के कणों की वह न्यूनतम संख्या जिससे हम पानी में मिठास का अनुभव करते हैं, उसे मिठास की निरपेक्ष सीमा कहते हैं।

उल्लेखनीय है कि निरपेक्ष सीमा निश्चित बिंदु नहीं होती, बल्कि यह व्यक्तियों की आगिक दशाओं एवं उनकी अभिप्रेरणात्मक स्थितियों के आधार पर विशेष रूप से सभी व्यक्तियों एवं परिस्थितियों में परिवर्तित होती रहती है। इसलिए उसका मूल्यांकन हमें विविध प्रयासों के आधार पर करना चाहिए। 50 प्रतिशत अवसरों पर चीनी के कणों की जिस संख्या से पानी में मिठास का अनुभव हो सकता है वह मिठास की निरपेक्ष सीमा होगी। यदि हम चीनी के और कणों को मिलाएँ तो इसकी संभावना अधिक है कि पानी प्रायः मीठा ही बताया जाएगा न कि सादा।

हमारे लिए जैसे सभी उद्दीपकों को जान पाना संभव नहीं होता वैसे ही समस्त प्रकार के उद्दीपकों के मध्य अंतर कर पाना भी संभव नहीं होता है। यह जानने के लिए कि दो उद्दीपक एक-दूसरे से भिन्न हैं, उन उद्दीपकों के मान में एक न्यूनतम अंतर होना अनिवार्य है। दो उद्दीपकों के मान में न्यूनतम अंतर जो उनकी अलग पहचान के लिए आवश्यक होता है, को भेद सीमा अथवा भेद देहरी (difference threshold or difference limen, DL) कहते हैं। इसे समझने के लिए हम अपने 'चीनी-पानी' वाले प्रयोग को दोहरा सकते हैं। जैसा कि हमने देखा, चीनी के कुछ कणों को मिला देने के पश्चात्‌ सादा पानी मीठा लगने लगता है। अब हम इस मिठास को याद करें। अगला प्रश्न उत्पन्न होता है कि पानी में चीनी के कितने और कण मिलाने की आवश्यकता होगी, जिससे मिठास के पिछले अनुभव से भिन्न प्राप्त हों ? चीनी का एक-एक कण पानी में डालें और प्रत्येक बार पानी का स्वाद चखें। कुछ कणों को मिलाने के बाद हम अनुभव करेंगे कि अब पानी की मिठास पूर्व मिठास से अधिक है। पानी में मिलाए गए चीनी के कणों की संख्या जिससे मिठास का अनुभव पूर्व में हुए मिठास के विश की तुलना में 50 प्रतिशत अवसरों पर भिन्न हो तो उसे मिठास की भेद देहरी कहेंगे। इस प्रकार उद्दीपक में वह न्यूनतम परिवर्तन जो 50 प्रतिशत प्रयासों में संवेदन भिन्नता कराने में सक्षम है, उसे भेद सीमा कहते हैं।

shaalaa.com
संवेदन प्रकारताएँ
  Is there an error in this question or solution?
Chapter 5: संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ - समीक्षात्मक प्रश्न [Page 109]

APPEARS IN

NCERT Psychology [Hindi] Class 11
Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ
समीक्षात्मक प्रश्न | Q 1. | Page 109
Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×