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काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरेमदिर ऊँघते रहते सब-जगकर रजनी भर तारा। - Hindi (Elective)

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Question

काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे
मदिर ऊँघते रहते सब-जगकर रजनी भर तारा।

Short Note

Solution

प्रस्तुत काव्यांश में उषा का मानवीकरण कर उसे पानी भरने वाली स्त्री के रूप में चित्रित किया गया है। इन पंक्तियों में भोर का सौंदर्य सर्वत्र दिखाई देता है। कवि के अनुसार भोर रूपी स्त्री अपने सूर्य रूपी सुनहरे घड़े से आकाश रूपी कुएँ से मंगल पानी भरकर लोगों के जीवन में सुख के रूप में लुढ़का जाती है। तारें ऊँघने लगते हैं। भाव यह है कि चारों तरफ भोर हो चुकी है और सूर्य की सुनहरी किरणें लोगों को उठा रही हैं। तारे भी छुप गए हैं।
  1. उषा तथा तारे का मानवीकरण करने के कारण मानवीय अंलकार है।
  2. काव्यांश में गेयता का गुण विद्यमान है। अर्थात इसे गाया जा सकता है।
  3. जब-जगकर में अनुप्रास अलंकार है।
  4. हेम कुंभ में रूपक अलंकार है।
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कार्नेलिया का गीत
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Chapter 1.01: जयशंकर प्रसाद (देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत) - प्रश्न-अभ्यास [Page 6]

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NCERT Hindi - Antara Class 12
Chapter 1.01 जयशंकर प्रसाद (देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत)
प्रश्न-अभ्यास | Q 3. | Page 6

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हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे।

मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा।


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