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Question
निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।
लघु सुरधनु से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे। उड़ते खग जिस ओर मुँह किए-समझ नीड़ निज प्यारा। बरसाती आँखों के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल। लहरें टकराती अनंत की-पाकर जहाँ किनारा। हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे। मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा। |
Solution
संदर्भ: उरोक्त पंक्तियाँ कक्षा 12 के हिंदी विषय अंतरा किताब के काव्य कार्नेलिया के गीत से अवतरित है जिसके कवि जयशंकर प्रसाद जी है।
प्रसंग: यहाँ सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिंधु नदी के किनारे यूनानी शिविर के पास बैठी भारत की गौरवगाथा और प्राकृतिक सौंदर्य का बखान कर रही है।
व्याख्या: कार्नेलिया भारत के भौगोलिक और सांस्कृतिक सौंदर्य पर मुग्ध होते हुए इसे अपना देश मानती है। वह भारत भूमि की प्रशंसा करते हुए कहती है कि भारत भूमि ही वह भूमि है जहाँ सर्वप्रथम ज्ञान और सभ्यता का सूर्य उदित हुआ। यहाँ के निवासियों के हृदय में प्रेम और अपनत्व की मिठास भरी हुई है। इस भारत भूमि पर सुदूर देशों से आने वाले अनजान लोगों अथवा शरणार्थियों को भी आश्रय मिल जाता है। उन्हें यहाँ के लोग इस प्रकार अपना लेते हैं कि उन्हें यह देश अपना देश लगने लगता हे।
कार्नेलिया को भारत में प्रात:कालीन दृश्य अत्यंत मनमोहक लगता है। इस दृश्य का वर्णन करते हुए वह कहती है कि सूर्य का लाल प्रकाश पेड़ों की शाखाओं से छनकर चारों ओर फेलता है, यह प्रकाश तालाब में खिले कमल के पुष्पों को भी आभायुक्त बना देता है उस समय ऐसा लगता है मानों पेड़ों की शाखाएँ प्रसन्न होकर नाच रही हैं। प्रात:काल में हरी-भरी धरती पर जब सूर्य की लाल किरणें बिखरती हैं तो ऐसा लगता है कि किसी ने सजीव जगत के ऊपर मंगलकारी सिंदूर बिखेर दिया है अर्थात् सबके मन में एक कल्याणकारी भावना का उदय हो जाता है।
विशेष (काव्यगत विशेषताएँ):
- चित्रण - भारतभूमि के सांस्कृतिक व प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण।
- भाषा - विषयानुकूल सरस और तत्सम प्रधान खड़ी बोली।
- अलंकार - मानवीकरण, रुपक, उत्प्रेक्षा (उदाहरण)।
- रस - अद्भुत एवं शांत रस।
- माधुर्य गुण तथा गेयता का गुण।
Notes
- प्रसंग - 2 अंक
- व्याख्या - 2 अंक
- विशेष + भाषा - 2 अंक
APPEARS IN
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कार्नेलिया का गीत कविता में प्रसाद ने भारत की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया है?
काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे
मदिर ऊँघते रहते सब-जगकर रजनी भर तारा।
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