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Question
कभी - कभी कहा जाता है की शीतलयुद्ध सीधे तौर पर शक्ति के लिए संघर्ष था और इसका विचारधारा कोई संबंध नहीं था। क्या आप इस कथन से सहमत है? अपने उत्तर के समर्थन में एक उदाहरण दें।
Solution
हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ की शीतलयुद्ध शक्ति के लिए संघर्ष था। शीतलयुद्ध पशिचमी गुट तथा सोवियत गुट के बीच एक संघर्ष था। कुछ विद्धनों का तो मन्ना है की पशिचमी गुट लोकतंत्र, उदारवाद और पूंजीवादी अर्थव्यस्था का समर्थक था जबकि सोवियत संघ गुट जनवादी लोकतंत्र अथवा साम्यवादी दल की तानाशाही, लोकतान्त्रिक केंद्रवाद तथा समाजवादी अर्थव्यस्था का समर्थन था। सोवियत संघ संपूर्ण विश्व में साम्यवाद का प्रसार करना चाहता था जबकि पशिचमी गुट उसके प्रसार को रोकना चाहता था तथा विश्व में लोकतंत्रिक शासन व्यवस्था को स्थापित करना चाहता था। इस प्रकार शीत युद्ध दो विचार - धाराओं के बीच टकराव और संघर्ष था।
परन्तु विचारधाराओ के टकराव के पीछे की वास्तविक स्थिति यह थी की दोनों ही महाशक्तियों अपने वर्चस्व को स्थापित करना चाहती थी दूसरे विश्व युद्ध से पहले अमरीका को विश्व की राजनिति में महाशक्ति नहीं माना जाता था बल्कि ब्रिटेन को यह स्थिति प्राप्त थी, फ्रांस को भी महत्वपूर्ण शक्ति माना जाता था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमरीका और सोवियत संघ महाशक्तियों के रूप में उभरकर आए। उसके बाद इन दोनों में प्रथम स्थान की प्राप्ति के लिए संघर्ष आरंभ हो गया यदि विचारधाराओं के संघर्ष को आधार माना जाए तो दूसरे विश्व युद्ध में सोवियत संघ को मित्र राष्टों को सम्मिलित किये जाने का प्रश्न ही पैदा न होता और जर्मनी द्वारा रूस पर आक्रमण को पशिचमी देशो द्वारा वैसे ही दृष्टिगोचर किया जाता। परन्तु सोवियत संघ साम्यवादी विचारधारा वाला होते हुए भी मित्र राष्टों में सम्मिलित था और सक्रिय सहयोगी था। इतिहास इस बात का साक्षी है की विश्व राजनितिक में प्रत्यक देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए ही अपने संबंध स्थापित करता है और विदेशी निति का संचालन करता है, केवल विचारधारा के आधार पर नहीं। प्रत्येक राष्ट्र अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते है। इसका एक उदाहरण - 1971 के भारत - पाक युद्ध के समय की घटना है। इस युद्ध में संयुक्त राज्य अमरीका ने पाकिस्तान की सहायता हेतु तथा भारत को चेतावनी देने के तौर पर अपना जंगी बेडा बंगाल की खाड़ी कर दिया। क्या अमरीका की विचारधारा पाकिस्तान की शासन व्यवस्था से मेल खाती थी। भारत सोवियत गुट का भी सदस्य नहीं था। भारत के लिए संकट की घड़ी थी। इस समय सोवियत संघ ने भारत की सहायता की और अमरीका को चेतावनी देते हुए अपना जंगी बेडा अमरिकी बेड़े के पीछे ला खड़ा किया। अमरीका का चुप रहना पड़ा। क्या भारत की विचारधारा साम्यवादी प्रणाली से मेल खाती थी। वास्तव में दोनों महासक्तियो हर क्षेत्र में और हर कदम पर एक - दूसरे को परास्त करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती थीं और स्वयं को संसार में प्रथम स्थान और स्थापित करना चाहिए थीं। इस प्रकार शीतलयुद्ध शक्ति के लिए संघर्ष था।
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निम्न में से कौन - सा कथन गुट - निरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों पर प्रकाश नहीं डालता?
नीचे कुछ देशों की एक सूची दी गई है। प्रत्येक के सामने लिखे की वह शीलयुद्ध के दागन किस गुट से जुड़ा था?
- पोलैंड
- फ्रांस
- जापान
- नाइजीरिया
- उत्तरी कोरिया
- श्रीलंका
नीचे महाशक्तिया द्वारा बनाए सैन्य संगठन की विशेषता बताने वाले कथन दिए गए हैं। कथन के सामने सही या गलत का चिन्ह लगाएँ।
गठबंधन के सदस्य देशों को अपने भू - क्षेत्र में महाशक्तियों के सैन्य अड्ड़े के लिए स्थान देना जरुरी था।
नीचे महाशक्तिया द्वारा बनाए सैन्य संगठन की विशेषता बताने वाले कथन दिए गए हैं। कथन के सामने सही या गलत का चिन्ह लगाएँ।
जब कोई राष्ट्र किसी एक सदस्य देश पर आक्रमण करता था तो इसे सभी सदस्यों देशो पर आक्रमण समझा जाता था।
'गुट - निरपेक्ष आंदोलन अब अप्रासंगिक हो गया है' आप इस के बारे में क्या सोचते हैं। अपने उत्तर के समर्थन में तर्क प्रस्तुत करें।