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क्या आप मानते हैं कि माओ त्सेतुंग और चीन के साम्यवादी दल ने चीन को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की बुनियाद डालने में सफलता प्राप्त की? - History (इतिहास)

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Question

क्या आप मानते हैं कि माओ त्सेतुंग और चीन के साम्यवादी दल ने चीन को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की बुनियाद डालने में सफलता प्राप्त की?

Long Answer

Solution

अधिकतर इतिहासकार इस विचार से सहमत हैं कि माओ त्सेतुंग और चीन के साम्यवादी दल ने चीन को मुक्ति दिलाने और इसकी मौजूदा कामयाबी की बुनियाद डालने में सफल रहे।

प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् से ही चीन में साम्यवादियों के प्रभाव में बढ़ोतरी होने लगी थी। 1921 ई० में साम्यवादी दल की स्थापना की गई जो अपने प्रारंभिक चरण में ही एक शक्तिशाली दल के रूप में उभरने लगा। हालाँकि एक समय चीन में दो सरकारों का अस्तित्त्व था। इनमें से एक कुओमीनतांग (राष्ट्रवादी दल) की सरकार थी। इसके अध्यक्ष सन यात-सेन थे। दूसरी सरकार का अध्यक्ष एक सैनिक जनरल च्यांग कोईशेक था। इसका मुख्यालय बीजिंग में था। डॉ० सन यात-सेन की मृत्यु के पश्चात् कुओमीनतांग का नेतृत्व च्यांग कोईशेक की सरकार के विरोध में था, क्योंकि वह अमरीका तथा ब्रिटेन के हाथों का कठपुतली मात्र था। मुद्रास्फीति की वजह से जनसामान्य की मुसीबतें बढ़ गई थी। जनता दोहरी मार झेल रही थी। पहली मार कर के रूप में थी जो जनता की कमर तोड़ रही तो दूसरी मार खाद्य-वस्तुओं की वजह से महँगाई थी।

चीनी साम्यवादी पार्टी के मुख्य नेता माओ त्सेतुंग की कोशिशों के फलस्वरूप यह पार्टी एक मजबूत राजनैतिक शक्ति बन गई थी। माओ त्सेतुंग घोर परिवर्तनवादी थे। उन्होंने एक ताकतवर किसान सोबित का गठन किया और भूमि अधिग्रहण करके पुनः नए नियमों के अनुसार वितरण किया। साथ-साथ उन्होंने स्वतंत्र सरकार एवं सैन्य-संगठन पर बल दिया। माओ त्सेतुंग स्त्रियों की समस्याओं से पूरी तरह से परिचित थे। अतः उन्होंने ग्रामीण महिला संघों को प्रोत्साहन दिया। विवाह संबंधी नए कानूनों का निर्माण किया। इन्होंने विवाह संबंधी समझौतों या क्रय-विक्रय पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया। तलाक की प्रक्रिया को आसान बनाया। वास्तविकता तो यह भी है कि माओ त्सेतुंग एक शोषणमुक्त राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे।

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के पश्चात चीन को जापानी प्रभाव से पूरी तरह से मुक्ति मिल गई। तत्पश्चात् माओ त्सेतुंग के अधीन साम्यवादियों और च्योग कोई-शेक के नेतृत्व में राष्ट्रवादियों में सत्ता के गृहयुद्ध शुरू हो गया। इस संघर्ष में साभ्यवादियों की जीत हुई। अक्टूबर सन् 1943 को चीन में ‘पीपुल्स रिपब्लिक’ ऑफ चाइना’ के नाम से गणतंत्रीय सरकार की स्थापना कर दी गई।

नए गणतंत्र के प्रथम राष्ट्रपति माओ त्सेतुंग और प्रथम प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई बने। इस सरकार ने अपने आरंभिक वर्षों में कुछ अहम् भूमि सुधार संबंधी कानून लागू किए। औद्योगिक क्रांति के लिए एक सुनियोजित कार्यक्रम भी तैयार किया गया। अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्रों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित कर दिया गया। निजीकरण को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया गया। 1953 तक इस कार्यक्रम के अनुसार आचरण होता रहा। इसके उपरांत समाजवादी परिवर्तन का कार्यक्रम बनाने की घोषणा की गई।

मौजूदा कार्यक्रम के तहत आंतरिक क्षेत्र में चीन जिस नए कार्यक्रम के तहत आंतरिक क्षेत्र में चीन जिस नए कार्यक्रम का पालन किया वह “लंबी छलाँग” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस कार्यक्रम का प्रमुख लक्ष्य आर्थिक सुधार करना था। माओ ने 1954 ई० में तथा 1956 ई० में क्रमशः कृषि का सहकारिताकरण तथा सामूहिकीकरण आरंभ करने की दिशा में अहम कदम उठाया चीनवासियों को अपने-अपने घरों के पिछवाड़े इस्पात की भट्ठियाँ लगाने के लिए प्रेरित किया गया। गाँवों में ‘पीपुल्स कम्यून्स’ स्थापित किए गए। ये सामूहिक उत्पादन तथा सामूहिक अधिकार के तहत कार्य करते थे। ऐसे समुदायों में चीन के 98% कृषक आते थे।

माओ त्सेतुंग ऐसे ‘समाजवादी’ व्यक्तियों का निर्माण करना चाहते थे, जिन्हें पितृभूमि, जनता, काम, विज्ञान तथा जनसंपत्ति पाँचों से बेहद प्यार हो। उन्होंने महिलाओं के लिए ‘ऑल चाइना डेमोक्रेटिस वीमेन्स फेडरेशन’ तथा विद्यार्थियों के लिए ऑल चाइना स्टूडेंट्स फेडरेशन’ का निर्माण किया। वे योग्यता से अधिक महत्त्व विचारधारा को देते थे। अतः माओवादियों तथा उनके आलोचकों के मध्य संघर्ष प्रायः होता रहता था। माओ त्सेतुंग ने अपने आलाचकों को मुँहतोड़ जवाब देने

के लिए 1965 ई० में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति का प्रारंभ किया। इसके अंतर्गत पुरानी आदतों, पुरानी संस्कृति तथा पुराने रिवाजों के प्रतिक्रियास्वरूप अभियान छेड़े गए। इन अभियानों में मुख्य रूप से सेना एवं छात्रों का प्रयोग किया गया। साम्यवादी विचारधारा पेशेवर योग्यता पर भारी पड़ी। दोषारोपण ने नारेबाजी और तर्कसंगत वाद-विवाद आच्छादित कर दिया।

जनमुक्ति सेना के युवा अंग लाल रक्षकों द्वारा क्रांति को करने या जारी रखने के नाम पर भयंकर अत्याचार किए गए। माओ त्सेतुंग की विचारधारा को न मानने वालों को नाना प्रकार की मुसीबतों और यातनाओं का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था एवं शिक्षा व्यवस्था में रुकावट आने लगी। साथ-साथ पार्टी भी बेहद कमजोर हुई। हालाँकि 1970 ई० में चीन की परिस्थितियों तेजी से बदलने लगीं। वहाँ की अर्थव्यवस्था विकास के पथ पर अग्रसर होने लगी। तथा चीन परमाणु शक्ति से भी संपन्न हो गया। राष्ट्रपति निक्सन के काल में संयुक्त राज्य अमरीका ने भी साम्यवादी चीन को मान्यता प्रदान कर दी। कालांतर में वह संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता तथा सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी बन गया।

इस प्रकार यह कहना उचित ही होगा कि चीन को मुक्ति दिलाने तथा इसकी तत्कालीन कामयाबी की आधारशिला रखने में साम्यवादी दल के प्रमुख माओ त्सेतुंग ने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।

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चीन - चीनी साम्यवादी दल का उदय
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Chapter 11: आधुनिकीकरण के रास्ते - अभ्यास [Page 259]

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NCERT History [Hindi] Class 11
Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते
अभ्यास | Q 7. | Page 259
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