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Question
क्या पड़ोसियों के साथ जापान के युद्ध और उसके पर्यावरण का विनाश तीव्र औद्योगीकरण की जापानी नीति के चलते हुआ?
Solution
इतिहासविदों का मानना है कि औद्योगीकरण की जापानी नीति ने ही जापान को पड़ोसियों के साथ युद्धों में उलझा दिया और उसके पर्यावरण को समाप्तप्राय कर दिया। मेजी पुनस्र्थापना के तकरीबन चालीस वर्षों के अंतराल में जापान ने आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की। वहाँ के तत्कालीन सम्राटों ने विदेशियों को जंगली समझकर उनकी विशेषताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया, अपितु उनसे स्वयं सीखने का प्रयत्न किया।
‘फुकोकु क्योहे’ अर्थात् ‘समृद्ध देश, मजबूत सेना’ के नारे के साथ सरकार ने अपनी नवीन नीति की घोषणा की। इस नयी नीति का उद्देश्य था-अपनी अर्थव्यवस्था एवं सेना को मजबूत बनाना। मेजी सुधारों के अंतर्गत अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण पर अत्यधिक बल दिया गया। सरकार ने उद्योगों के विकास हेतु विदेशों से भी सहायता ली। सूती वस्त्र उद्योग को प्रोत्साहित करने हेतु कपास की नयी-नयी किस्मों को विकसित करने का प्रयास किया गया। संचार और यातायात के अत्याधुनिक संसाधनों ने आर्थिक क्रांति में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक जापान की गिनती विश्व के सर्वोत्तम औद्योगिक देशों में होने लगी।
औद्योगिक विकास की तीव्र गति ने जापान को पड़ोसियों के साथ युद्ध करने के लिए विवश कर दिया। जापान भी बाजार की खोज में 19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक दौड़ में सम्मिलित हो गया। जापान के साम्राज्यवाद का एक अन्य प्रमुख कारण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता को साबित करना था। फलतः उसे 1894 ई०-95 ई० में चीन के साथ और 1904-05 में रूस के साथ युद्ध करना पड़ा।
1872 ई० में जापान की जनसंख्या 3.5 करोड़ थी। औद्योगिकीकरण की वजह से 1920 आते-आते जापान की जनसंख्या 5.5 करोड़ हो गयी।
प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान की अर्थव्यवस्था निरंतर विकास की ओर बढ़ने लगी। वह सूती वस्त्र, रेयन और कच्चे रेशम का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया। युद्धों के परवर्ती काल में इंजीनियरिंग एवं लोहा-इस्पात उद्योग के क्षेत्र में जापान ने अद्वितीय विकास किया। तीव्र गति से औद्योगिक विकास का एक नकारात्मक पक्ष था-पर्यावरण का दिन-पर-दिन दूषित होना। औद्योगिक विकास ने लकड़ी की माँग में वृद्धि की जिससे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई। फलतः पर्यावरण पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। प्रथम संसद (1897 ई० में) के निम्न सदन के सदस्य तनाको शोज़ों ने औद्योगिक प्रदूषण के विरोध में पहला आंदोलन किया। उनका मानना था कि मानवीय हितों को नजरअंदाज करके औद्योगिक विकास करना मानव जाति के प्रति क्रियावादी कदम है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् जापान में होने वाले तीव्र औद्योगिक विकास का जनसामान्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा। अरगजी को जहर एक भयंकर कष्टदायी बीमारी का कारण था। यह एक आरंभिक सूचक भी था। फलतः 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में हवा इतनी दूषित हो गई कि अनेक समस्याएँ उठ खड़ी हुईं।
अतः यह कहना उचित ही होगा कि तीव्र औद्योगिकीकरण की जापानी नीति ने जापान को सीमावर्ती देशों के साथ युद्धों में उलझा दिया। साथ-साथ वहाँ के पर्यावरण को भी दूषित कर दिया।