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Question
मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। अशोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-कौन से तत्त्वों के प्रमाण मिलते हैं?
Solution
मौर्य प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ-मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी। इसी नगर से मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने साम्राज्य को चारों दिशाओं में विस्तृत किया था। मौर्य साम्राज्य उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान से लेकर दक्षिण में सिद्धपुर तक, पूर्व में बिहार से लेकर पश्चिम में सौराष्ट्र तक फैला हुआ था। अशोक ने कलिंग (उड़ीसा) को जीतकर मौर्य साम्राज्य को और अधिक विस्तृत किया।
- केंद्रीय शासन-
सम्राट तथा उसके मंत्रियों द्वारा सीधे राजधानी से संचलित होने वाले शासन को केंद्रीय शासन कहते हैं। इस केंद्रीय शासन के अंतर्गत सम्राट के कार्य, मंत्रिपरिषद्, न्याय-व्यवस्था, सैनिक व्यवस्था, पुलिस, गुप्तचर तथा लोक-कल्याणकारी कार्यों आदि के प्रबंध का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है1. सम्राट-चंद्रगुप्त द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था पूर्णत: केंद्रीय शासन व्यवस्था थी। संपूर्ण साम्राज्य पर केंद्रीय शासन को नियंत्रण था। इस केंद्रीय शासन का प्रमुख सम्राट था जो सर्वशक्तिशाली एवं शासन का केंद्रबिंदु था। वही कानून बनाने की, उन्हें लागू करने की तथा न्याय करने की अंतिम शक्ति रखता था। वह स्वयं सेना के संगठन की व्यवस्था करता था तथा युद्ध में सेना का संचालन करता था।
अतः इस दृष्टि से वह स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासक था। इतिहासकार स्मिथ का कहना है कि-“चंद्रगुप्त के शासन प्रबंध से जो तथ्य प्रकट होते हैं, उनसे सिद्ध होता है कि वह कठोर निरंकुश शासक था।” किंतु चंद्रगुप्त के शासन प्रबंध ने जो शक्तियाँ सम्राट को दी थीं, वे केवल सैद्धांतिक रूप से ही उसके पास थीं। वह उन शक्तियों को व्यवहार में लाने से पूर्व अपने मंत्रियों व परामर्शदाताओं से सलाह करता था। सम्राट पर परंपरागत कानूनों तथा नैतिक कानूनों को भी बंधन था। चाणक्य ने राजा के कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन किया है और उसमें राजा को जनहित के कार्यों के लिए प्रेरित किया है। ऐसा न करने पर राजा अपनी प्रजा के ऋण से निवृत्त नहीं हो सकता। इस प्रकारे चंद्रगुप्त मौर्य को हम उदार निरंकुश शासक कह सकते हैं।
- मंत्रिपरिषद्-
कौटिल्य का विश्वास था कि सम्राट राज्य का एक पहिया है। राज्य को सुचारु रूप से चलाने के लिए दूसरे पहिए मंत्रिपरिषद् की आवश्यकता होती है जो अति महत्त्वपूर्ण मामलों पर सम्राट को परामर्श दे सके। सम्राट मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को उनकी बुद्धिमत्ता तथा सच्चरित्रता देखकर नियुक्ति करता था। ये वेतनभोगी होते थे। मंत्रिपरिषद् के निर्णय सर्वमान्य होते थे किंतु राजा को विशेषाधिकार भी प्राप्त थे और वह उन निर्णयों को मानने के लिए बाध्य न था। ऐसा प्रतीत होता है कि अति महत्त्वपूर्ण मामलों पर निर्णय लेने के लिए ही मंत्रिपरिषद् की बैठक बुलाई जाती थी। दैनिक कार्यों के लिए मंत्रिपरिषद् की एक अंतरंग सभा जिसमें प्रधानमंत्री, पुरोहित, सेनापति आदि होते थे, की व्यवस्था की गई।
- न्याय व्यवस्था-
चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने विद्वान तथा कूटनीतिज्ञ महामंत्री चाणक्य के परामर्श से एक श्रेष्ठ न्याय व्यवस्था की स्थापना की थी। आज भी सभ्य संसार में उस न्याय व्यवस्था के मूल तत्वों का अनुकरण किया जा रहा है। संपूर्ण न्याय व्यवस्था का प्रधान न्यायाधीश सम्राट चंद्रगुप्त स्वयं था। उसके नीचे अनेक छोटे-बड़े न्यायाधीश होते थे। नगरों व जनपदों के लिए अलग-अलग न्यायाधीशों की व्यवस्था थी। नगरों में न्यायाधीश ‘राजुक’ कहलाते थे। ग्रामों में पंचायतें भी छोटे-छोटे मुकदमों का फैसला करती थीं। न्यायालय दो प्रकार के होते थे-दीवानी (धन संबंधी) मुंकदमों का फैसला करने वाले न्यायालय ‘धर्मस्थीय’ कहलाते थे और फौजदारी मुकदमों का फैसला करने वाले न्यायालय ‘कण्टकशोधन’ कहलाते थे। निचले न्यायालयों के मुकदमों के फैसलों के विरुद्ध अपीलें बड़े न्यायालयों में सुनी जाती थीं। अपराधों को कम करने के लिए चंद्रगुप्त के काल में कठोर दंड दिए जाते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार अठारह प्रकार के दंड दिए जाते थे। जुर्माने, अंगभंग तथा मृत्युदंड का दंड साधारण रूप में दिया जाता था। कठोर दंड के कारण अपराध बहुत कम हो गए थे। लोग घरों में बिना ताला लगाए भी बाहर चले जाते थे।
- सैनिक व्यवस्था-
चंद्रगुप्त मौर्य ने चतुरंगिणी की व्यवस्था की थी अर्थात् उसकी सेना चार भागों में विभाजित थीं-पैदल, अश्वारोही, हाथी, रथ। इसके अतिरिक्त उसने जल सेना का भी गठन किया था। मेगस्थनीज़ ने चंद्रगुप्त की सैनिक व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया है। उसके अनुसार उसकी सेना में छह लाख पैदल सैनिक, तीस हज़ार अश्वारोही, नौ हज़ार हाथी तथा आठ हजार रथ थे। इतनी विशाल सेना रखने का प्रमुख कारण चंद्रगुप्त की महत्त्वाकांक्षाएँ थीं। उसने अनेक छोटे राज्यों को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना सेना के आधार पर ही की थी। वास्तव में वह युग ‘सैनिक युग था और साम्राज्य का आधार सेना होती थी। चंद्रगुप्त ने इसी विशाल सेना के आधार पर यवनों को पराजित करके देश से बाहर खदेड़ा, नंदवंश का नाश किया और सुव्यवस्थित शासन के द्वारा शांति स्थापित की।
सम्राट प्रधान सेनापति होता था। वह युद्ध में सेना का संचालन भी करता था। चंद्रगुप्त इस विशाल सेना की व्यवस्था के लिए एक ‘युद्ध-परिषद्’ का गठन किया था जिसके तीस सदस्य थे। ये तीस सदस्य छह समितियों में विभाजित थे। इस प्रकार पाँच सदस्यों की प्रत्येक समिति सेना के एक भाग की व्यवस्था देखती थी। पहली समिति जल सेना का प्रबंध करती थी, दूसरी समिति सेना के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री तथा रसद का प्रबंध करती थी, तीसरी, चौथी, पाँचवीं एवं छठी समितियाँ क्रमशः पैदल, अश्वारोही, हाथी तथा रथ सेना की व्यवस्था देखती थी। ये सेनाएँ स्थायी थीं। राज्यकोष से सैनिकों को वेतन मिलता था।
- राजा के अधिकारियों के कार्य-
मौर्य सम्राट के द्वारा नियुक्त विभिन्न अधिकारी विभिन्न कार्यों का निरीक्षण किया करते थे। साम्राज्य के अधिकारियों में से कुछ नदियों की देख-रेख और भूमिमापन का काम करते थे। कुछ प्रमुख नहरों से उपहारों के लिए छोड़े जाने वाले पानी के मुखद्वार का निरीक्षण करते थे ताकि हर स्थान पर पानी की समान पूर्ति हो सके। यही अधिकारी शिकारियों का संचालन करते थे और शिकारियों के कृत्यों के आधार पर उन्हें इनाम या दंड देते थे। वे कर वसूली करते थे और भूमि से जुड़े सभी व्यवसायों का निरीक्षण करते थे। साथ ही लकड़हारों, बढ़ई, लोहारों और खननकर्ताओं का भी निरीक्षण करते थे।
मौर्यकालीन शीर्षस्थ अधिकारी (तीर्थ)तीर्थ संबंधित विभाग 1. मंत्री प्रधानमंत्री 2. सेनापति युद्ध विभाग का मंत्री 3. युवराज राजा का उत्तराधिकारी 4. समाहर्ता राजस्व विभाग का मंत्री 5. सन्निधाता राजकीय कोषाध्यक्ष 6. प्रदेष्टा फैजदारी न्यायालय का न्यायाधीश 7. नायक नगर रक्षा का अध्यक्ष 8. करमरन्तिक उधोग एव कारखानों का प्रधान 9. दण्डपाल सर्वोच्च पुलिस अधिकारी 10. नगरक (पैर) नगर व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी 11. दुर्गपाल राजकीय दुर्ग रक्षको का प्रधान 12. अन्तपाल सीमावर्ती दुर्गो का रक्षको 13. आटविक वन विभाग का प्रधान 14. दौवरिक राजमहलों की व्यवस्था का प्रधान 15. आंतवरसिक अंत:पुर का अध्यक्ष 16. मन्त्रीपरिषदअध्यक्ष परिषद का अध्यक्ष अशोक के अभिलेखों में मौर्य प्रशासन के प्रमुख तत्त्व अशोक के अभिलेखों में हमें मौर्य प्रशासन के अनेक प्रमुख तत्वों की झलक मिलती है। अभिलेखों में हमें प्रशासन के प्रमुख केंद्रों, पाटलिपुत्र, तक्षशिला, उज्जैन, सुवर्णगिरि, तोशाली, कौशाम्बी आदि का बार-बार उल्लेख मिलता है। कलिंग अभिलेखों से पता चलता है कि तोशाली और उज्जैन के शासनाध्यक्षों को ‘कुमार’ कहा जाता था। ब्रह्मगिरि-सिद्धपुर अभिलेखों में । सुवर्णगिरि के शासनाध्यक्ष को ‘आर्यपुत्र’ कहा गया है।
अशोक के अभिलेखों में हमें महामात्रों और धर्म-महामात्रों का भी बार-बार उल्लेख मिलता है। महाशिलालेख V से पता चलता है कि सम्राट ने अपने राज्याभिषेक के तेरह वर्ष बाद महामात्रों की नियुक्ति प्रारंभ की थी। स्तंभ लेख VII में धर्म महामात्रों के कर्तव्यों पर प्रकाश डाला गया है। इसमें कहा गया है कि धम्म-महामात्रों को सभी वर्गों में धर्म का प्रचार करना चाहिए और धम्म का अनुसरण करने वालों की उन्नति की ओर ध्यान देना चाहिए। अशोक ने स्त्रियों की भलाई के लिए स्त्रीअध्यक्ष महामात्रों की नियुक्ति की थी। उनका उल्लेख भी अभिलेखों में मिलता है। जिला प्रशासन में नियुक्त राजुक तथा युक्त जैसे अधिकारियों का उल्लेख महाशिलालेख III और स्तंभ लेख I और IV में मिलता है। स्तंभ लेख IV से पता चलता है कि राजुक का प्रमुख कार्य जनपद के लोगों की भलाई के लिए करना था।
अशोक ने उन्हें लोगों को अच्छे कामों के लिए सम्मानित करने तथा बुरे कामों के लिए दंडित करने का अधिकार भी प्रदान कर दिया था। महाशिलालेख III से पता चलता है कि युक्त के कार्यों में मुख्य रूप से सचिव के कार्य सम्मिलित थे। राजस्व का संग्रह और उसका हिसाब रखना उसके कार्यों के अंतर्गत आता था। महाशिलालेख VI और अन्य शिलालेखों में भी प्रतिवेदकों का उल्लेख मिलता है। प्रतिवेदक सम्राट अथवा केंद्रीय सरकार के प्रमुख संवाददाता होते थे। उनकी पहुँच सीधे सम्राट तक थी। महाशिलालेख VI से पता चलता है कि सम्राट अशोक को सदा प्रजाहिंत की चिंता रहती थी। इसमें कहा गया है- राजन् देवानांपिय पियदस्सी यह कहते हैं; अतीत में मसलों को निपटाने और नियमित रूप से सूचना एकत्र करने की व्यवस्थाएँ नहीं थीं। किन्तु मैंने व्यवस्था की है कि लोगों के समाचार हम तक प्रतिवेदक सदैव पहुँचाए।
चाहे मैं कहीं भी हूँ, खाना खा रहा हूँ, अन्त:पुर में हूँ, विश्राम कक्ष में हूँ, गोशाले में हूँ या फिर पालकी में मुझे ले जाया जा रहा हो अथवा वाटिका में हूँ। मैं लोगों के विषयों का निराकरण हर स्थल पर करूंगा।” इसी प्रकार धर्मसहनशीलता जो मौर्य प्रशासन का एक प्रमुख अभिलक्षण था, का उल्लेख भी हमें अशोक के शिलालेखों में मिलता है। महाशिलालेख XII में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मनुष्य को अपने धर्म का आदर करना चाहिए, किन्तु दूसरे धर्मों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। नि:संदेह, मौर्य साम्राज्य का भारतीय इतिहास में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह साम्राज्य भारत भूमि पर स्थापित साम्राज्यों में सबसे पहला और सर्वाधिक विशाल साम्राज्य था। इसे साम्राज्य की स्थापना के साथ ही भारतीय इतिहास अंधकार से प्रकाश के युग में प्रवेश करता है।