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Question
मुद्रा के प्रमुख कार्य क्या-क्या हैं? मुद्रा किस प्रकार वस्तु विनिमय प्रणाली की कमियों को दूर करता है?
Long Answer
Solution
मुद्रा के हैं कार्य चार – माध्यम, मापक, मानक, भण्डार”
मुद्रा के प्रमुख कार्यों को दो भागों में बाँटा जा सकता है।
1. प्राथमिक कार्य ।
2. गौण कार्य
- विनिमय का माध्यम-यह मुद्रा का सर्वप्रथम और सर्वमहत्वपूर्ण कार्य है। मुद्रा के इस कार्य ने क्रय और विक्रय की इस क्रिया को एक दूसरे से भिन्न कर दिया है। आज का समय सभी अर्थव्यवस्थाएँ मौद्रिक अर्थव्यवस्थाएँ हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली के सबसे बड़ी कमी दोहरे संयोग का अभाव है। इसे मुद्रा के इस कार्य से दूर कर दिया हैं अब यदि एक वस्त्रों का विक्रेता चावल खरीदना चाहता है तो उसे ऐसा चावल विक्रेता ढूंढने की आवश्यकता नहीं है जो बदले में वस्त्र चाहता है। वह वस्त्र बेचकर मुद्रा प्राप्त कर सकता है। और उस प्राप्त मुद्रा से चावल खरीद सकता है। अतः मुद्रा से दोहरे संयोग के अभाव की कमी स्वतः दूर हो जाती है। मुद्रा के इसी कार्य के कारण मुद्रा को सामान्यकृत क्रय शक्ति कहा जाता है।
- मूल्य की इकाई-मुद्रा का ‘लेखा की इकाई’ कार्य को मूल्यमान का मापक भी कहा जाता है। मुद्रा के इस कार्य को अर्थ है कि जिस प्रकार प्रत्येक चर को मापने की एक इकाई होती है वजन को किलो में, कद को सेमी. में, दूरी को किमी. में इसी प्रकार किसी वस्तु के मूल्य को मुद्रा में मापा जाता है। अतः मुद्रा मूल्य की मापक इकाई का कार्य करती है। यदि कोई पूछे कि इस पर्स का क्या मूल्य है। तो हम यह नहीं कहेंगे कि एक पर्स बराबर 5 किलो चावल या 10 पेन बल्कि हम मौद्रिक रूप में उसका मूल्य बतायेंगे। अतः मुद्रा लेखा की इकाई कार्य करती है। वस्तु विनिमय प्रणाली में सामान्य मूल्य मापक ‘या लेखा की इकाई का अभाव या जिसे मुद्रा के इस कार्य ने दूर कर दिया।
- स्थगित भुगतान का मान–आस्थगित भुगतान वे भुगतान होते हैं जो भविष्य में किसी समय भुगतान किये जाते हैं। क्योंकि मुद्रा का अपना मूल्य अर्थात् उसकी क्रय शक्ति सामान्यतः अपरिवर्ती रहती है। एक आधुनिक अर्थव्यवस्था में व्यावहारिक लेन-देन में साख और उधार का बहुत महत्व रहता है। आस्थागित भुगतान या भविष्य भुगतान मुद्रा में ही संभव होते हैं क्योंकि एक तो मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है और इससे मुद्रा का विनिमय का माध्यम कार्य उसे सामान्यकृत क्रयशक्ति प्रदान करता है। मुद्रा का प्रयोग भविष्य भुगतानों से संबंधित खतरे को भी कम कर देती है। आज के समय में मुद्रा के कारण ही इतने दीघकालीन
समझौते हो पाते हैं। - मूल्य का संचय-जब कोई व्यक्ति अपनी भविष्य की आवश्यकताओं के लिए मूल्य का संचय’ करना चाहता है तो वह केवल मुद्रा के रूप में ही कर सकता है। इसके कारण इस प्रकार हैं:
(i) मुद्रा की क्रय शक्ति अन्य वस्तुओं की तुलना में अपरिवर्तित रहती है।
(ii) मुद्रा को कीड़ा दीमक आदि नहीं लगता अर्थात् मुद्रा रखे हुए नष्ट नहीं होती।
(iii) मुद्रा का संचय करने में बहुत कम स्थान की आवश्यकता पड़ती है।
(iv) मुद्रा को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर या एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को भेजा जा सकता है मान लो कोई व्यक्ति अपनी बेटी की शादी के लिए अभी से कुछ बचत करना चाहते हैं तो क्या वे अभी से भोजन बनवा सकते हैं या वे अभी से वस्त्र खरीदकर रख सकते हैं? नहीं वे मुद्रा के रूप में अपने भविष्य की आवश्यकताओं के लिए मूल्य का संचय कर सकते हैं। - मूल्य का हस्तांतरण-मुद्रा के कारक मूल्य का हस्तांतरण आसान हो गया है। यदि किसी व्यक्ति को भारत से कनाडा में मूल्य का हस्तांतरण करना है तो मुद्रा के माध्यम से यह बहुत सहज हो गया है। बैंक मुद्रा इसमें और अधिक सहायक है। मुद्रा के इसी कार्य के कारण आज संपूर्ण विश्व एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तरह लेन-देन कर पा रहा है।
मुद्रा के प्रत्येक कार्य विनिमय प्रणाली की एक कमी को दूर कर रहा हैविनिमय प्रणाली की कमी मुद्रा का वह कार्य जो इस कमी को दूर कर रहा है।
विनिमय के दोहरे संयोग का अभाव मुद्रा का वह कार्य जो इस कमी को दूर कर रहा है आवश्कताओ के दोहरे संयोग का अभाव विनिमय के माध्यम के रूप में मूल्य की इकाई का आभाव लेखा / मूल्य की सामान्य मापक इकाई के रूप में स्थिगित भुगतानों के मापक का अभाव मुद्रा स्थगित भुगतानो के मापक के रूप में मूल्य के संचय का अभाव मूल्य का संचय मुद्रा के रूप में हस्तांतरण में कठिनाई मूल्य के हस्तांतरण का कार्य इस प्रकार मुद्रा का प्रत्येक कार्य वस्तु विनिमय प्रणाली की एक कमी को दूर कर रहा है।
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मुद्रा की माँग और मुद्रा की पूर्ति
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