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Question
निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए:
प्रतीक्षा की बहुत जोही बाट जेठ बीता, हुई वर्षा नहीं, नभ यों रहा खल्वाट आज है आषाढ़ वदि षष्ठी उठा था ज़ोर का तूफ़ान उसके बाद सघन काली घन घटा से हो रहा आच्छन्न यह आकाश आज होगी, सजनि, वर्षा-हो रहा विश्वास हो रही है अवनि पुलकित, ले रही नि:श्वास किंतु अपने देश में तो सुमुखि, वर्षा हुई होगी एक क्या, कै बार गा रहे होंगे मुदित हो लोग ख़ूब मलार भर गई होगी अरे वह वाग्मती की धार उगे होंगे पोखरों में कुमुद पद्म मखान आँख मूँदे कर रहा मैं ध्यान लिखूँ क्या प्रेयसि, यहाँ का हाल सामने ही बह रही भागीरथी, बस यही है कल्याण जिस किसी भाँति गर्मी से बचे हैं प्राण आज उमड़ी घन घटा को देख मन यही करता कि मैं भी, प्रियतमे, उसका करूँ आह्वान −कालिदास समान सामने सरपट पड़ा मैदान है न हरियाली किसी भी ओर तृण-लता तरुहीन नग्न प्रांतर देख उठ रहा सिर में बड़ा ही दर्द हरा धुँधला या कि नीला− आ रहा चश्मा न कोई काम किंतु मुझको हो रहा विश्वास यहाँ भी बादल बरसने जा रहा है आज अब न सिर में उठेगा फिर दर्द गंगा नहाते वक़्त आया ख्याल हिमालय में गल रही है बर्फ़: आज होगा ग्रीष्म ऋतु का अंत |
- 'आज वर्षा होगी' कवि के इस अति विश्वास का आधार क्या है? [1]
- जेठ मास का समाप्त होना।
- आषाढ़ मास का आगमन।
- धरती का प्रसन्न होना।
- आकाश में काले बादलों का घिर आना।
- 'उठ रहा सिर में बड़ा ही दर्द' −पंक्ति के संदर्भ में कवि के सिर में उठने वाले दर्द का कारण क्या है? [1]
- उसके स्वास्थ्य का ठीक न होना।
- समय पर वर्षा न होना।
- हरियाली विहीन प्रांतर का होना।
- भागीरथी में पानी कम होना।
- 'हो रहा आच्छन्न यह आकाश' −पंक्ति में 'आच्छन्न' शब्द का अर्थ है: [1]
- दबा हुआ।
- ढका हुआ।
- फैला हुआ।
- बिखरा हुआ।
- शहरी मैदान को कवि ने 'नग्न' क्यों कहा है? [1]
- तृण विहीन होने के कारण।
- लता विहीन होने के कारण।
- तरुहीन होने के कारण।
- वनस्पतिहीन होने के कारण।
- 'हो रही अवनि पुलकित, ले रही निःश्वास' −काव्य पंक्ति में कौन-सा अलंकार है? [1]
- अनुप्रास
- रूपक
- यमक
- मानवीकरण
Comprehension
Solution
- आकाश में काले बादलों का घिर आना।
व्याख्या: कवि का कहना है कि आकाश में काली घटा छाई है जिसके कारण आज वर्षा होगी। - हरियाली विहीन प्रांतर का होना।
- ढका हुआ।
- वनस्पतिहीन होने के कारण।
- रूपक
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