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Question
पहाडिया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दशई? ।
Solution
18वीं शताब्दी में पहाड़ी लोगों को पहाड़िया कहा जाता था। वे राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहा करते थे। वे जंगल की उपजे से अपना गुजर-बसर करते थे और झूम खेती किया करते थे। वे जंगल की छोटे-से हिस्से में झाड़ियों को काटकर और घास-फूस को जलाकर जमीन साफ कर लेते थे और राख की पोटाश से उपजाऊ बनी जमीन पर अपने खाने के लिए विभिन्न प्रकार की दालें और ज्वार-बाजरा पैदा करते थे। पहाड़ियों को अपना मूल आधार बनाकर पहाड़ी लोग वहाँ रहते थे। वे अपने क्षेत्र में बाहरी लोगों के प्रवेश का प्रतिरोध करते थे। उनके मुखिया लोग अपने समूह में एकता बनाए रखते थे, आपसी लड़ाई-झगड़े निपटा देते थे और मैदानी लोगों तथा अन्य जातियों से लड़ाई होने पर अपनी जनजाति का नेतृत्व करते थे।
इन पहाड़ियों को अपना मूलाधार बनाकर, पहाड़िया लोग बराबर उन मैदानों पर आक्रमण करते रहते थे जहाँ एक स्थान पर बस कर किसान अपनी खेती-बाड़ी किया करते थे। पहाड़ियों द्वारा ये आक्रमण अधिकतर अपने आपको विशेष रूप से अकाल या अभाव के वर्षों में जीवित रखने के लिए किए जाते थे। साथ-साथ यह मैदानों में बसे हुए समुदायों पर अपनी ताकत दिखलाने का भी एक तरीका था। इसके अलावा, ऐसे आक्रमण बाहरी लोगों के साथ अपने राजनीतिक संबंध बनाने के लिए भी किए | जाते थे। मैदानों में रहने वाले जमींदारों को अकसर इन पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज देकर उनसे शांति खरीदनी पड़ती थी। इसी प्रकार, व्यापारी लोग भी इन पहाड़ियों द्वारा नियंत्रित रास्तों का इस्तेमाल करने की अनुमति पत करने हेतु उन्हें कुछ पथ-कर दिया करते थे।
जब ऐसा पथ-कर पहाड़िया मुखियाओं की मिल जाता था तो वे व्यापारियों की रक्षा करते थे और यह भी आश्वस्त करते थे कि कोई भी उनके माल को नहीं लूटेगा। इस प्रकार कुछ ले-देकर की गई शांति संधि अधिक लंबे समय तक नहीं चली। यह 18वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में उस समय भंग हो गई जब स्थिर खेती के क्षेत्र की सीमाएँ आक्रामक रीति से पूर्वी भारत में बढ़ाई जाने लगीं। ज्यों-ज्यों स्थायी कृषि का विस्तार होता गया, जंगलों तथा चारागाहों का क्षेत्र संकुचित होता गया। इससे पहाड़ी लोगों तथा स्थायी खेतीहरों के बीच झगड़ा तेज हो गया। पहाड़ी लोग पहले से अधिक नियमित रूप से बसे हुए गाँवों पर आक्रमण करने लगे और ग्रामवासियों से अनाज और पशु छीन-झपटकर ले जाने लगे। 1770 के दशक में शांति स्थापना की कोशिश की गई जिसके अनुसार पहाड़िया मुखियाओं को अंग्रेजों द्वारा एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था और बदले में उन्हें अपने आदमियों का चाल-चलन ठीक रखने की जिम्मेदारी लेनी पड़ती थी। ज्यादातर मुखियाओं ने भत्ता लेने से इनकार कर दिया। और जिन्होंने इसे स्वीकार किया, उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे। औपनिवेशिक सरकार के वेतनभोगी बन जाने से उन्हें अधीनस्थ कर्मचारी या वैतनिक मुखिया माना जाने लगा।