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Question
वे कौन-सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया?
Long Answer
Solution
- संविधान सभा का स्वरूप निर्धारित करने में अनेक ऐतिहासिक शक्तियों ने योगदान दिया
- संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार अक्टूबर 1946 ई० को किया गया था। इसके सदस्यों का चुनाव 1946 ई० के प्रांतीय चुनावों के आधार पर किया गया था। संविधान सभा में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों द्वारा भेजे गए सदस्यों के साथ-साथ रियासतों के प्रतिनिधियों को भी सम्मिलित किया गया था। मुस्लिम लीग ने संविधान सभा की प्रारंभिक बैठकों में (अर्थात् 15 अगस्त, 1947 ई० से पहले) भाग नहीं लिया। इस प्रकार संविधान सभा पर विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्यों का प्रभाव था। इसके 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस के भी सदस्य थे।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य भिन्न-भिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे। यदि उनमें से कुछ ‘निरीश्वरवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ थे, तो कुछ, जैसा कि ऐ एंग्लो-इंडियन सदस्य फ्रेंक एंथनी का विचार था, “तकनीकी रूप से कांग्रेस के, किन्तु आध्यात्मिक स्तर पर आर०एस०एस० तथा हिन्दू महासभा के सदस्य थे। इन सबकी विचारधाराओं ने संविधान के स्वरूप निर्धारण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
- संविधान सभा में आर्थिक विचारों के विषय पर कुछ सदस्य समाजवादी थे और कुछ ज़मींदारों का समर्थन करने वाले थे। विभिन्न धर्मों एवं जातियों को प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से संविधान सभा में कुछ स्वतंत्र सदस्य एवं महिलाओं को भी नामांकित किया गया था। इन सभी ने संविधान के स्वरूप निर्धारण को अनेक रूपों में प्रभावित किया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विधि-विशेषज्ञों को संविधान सभा में स्थान दिए जाने पर विशेष ध्यान दिया गया था। सुप्रसिद्ध विधिवेत्ता एवं अर्थशास्त्री बी०आर० अम्बेडकर संविधान सभा के सर्वाधिक प्रभावशाली सदस्यों में से एक थे। उन्होंने संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में सराहनीय कार्य किया। गुजरात के वकील के०के०एम० तथा मद्रास के वकील अल्लादि कृष्ण स्वामी अय्यर बी०आर० अम्बेडकर के प्रमुख सहयोगी थे। इन दोनों के द्वारा संविधान के प्रारूप पर महत्त्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए गए।
- संविधान का स्वरूप निर्धारित करने में जनमत का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में होने वाली चर्चाओं पर जनमत को भी पर्याप्त प्रभाव होता था। जनसामान्य के सुझावों को भी आमंत्रित किया जाता था, जिसके परिणामस्वरूप सामूहिक सहभागिता का भाव उत्पन्न होता था। जनमत के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “सरकारें कागजों से नहीं बनतीं। सरकार जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है। हम यहाँ इसलिए जुटे हैं, क्योंकि हमारे पास जनता की ताकत है और हम उतनी दूर तक ही जाएँगे, जितनी दूर तक लोग हमें ले जाना चाहेंगे, फिर चाहे वे किसी भी समूह अथवा पार्टी से संबंधित क्यों न हों। इसलिए हमें भारतीय जनता की आकांक्षाओं एवं भावनाओं को हमेशा अपने जेहन में रखना चाहिए और उन्हें पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।”
- प्रेस में होने वाली आलोचना एवं प्रत्यालोचना ने भी संविधान के स्वरूप निर्धारण में योगदान दिया। हमें याद रखना चाहिए कि सभी प्रस्तावों पर सार्वजनिक रूप से बहस की जाती थी। किसी भी विषय पर होने वाली बहस में विभिन्न पक्षों की दलीलों को समाचारपत्रों द्वारा छापा जाता था। इस प्रकार, प्रेस में होने वाली आलोचना एवं प्रत्यालोचना किसी भी विषय पर बनने वाली सहमति अथवा असहमति को व्यापक रूप से प्रभावित करती थी।
- संविधान सभा को मिलने वाले सैकड़ों सुझावों में से कुछ नमूनों को देखने से ही यह भली-भाँति स्पष्ट हो जाता है। कि हमारे विधिनिर्माता परस्पर विरोधी हितों पर गहन विचार-विमर्श करने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे। उदाहरण के लिए, ऑल इंडिया वर्णाश्रम स्वराज्य संघ (कलकत्ता) का आग्रह था कि संविधान का आधार ‘प्राचीन हिन्दू कृतियों में उल्लिखित सिद्धांत’ होने चाहिए। विशेष रूप से यह माँग की गई कि गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया जाए तथा सभी बूचड़खानों को बंद कर दिया जाए। तथाकथित निचली जातियों के समूहों ने “सवर्णों द्वारा दुर्व्यवहार” पर रोक लगाने तथा विधायिका, सरकारी विभागों एवं स्थानीय निकायों आदि में जनसंख्या के आधार पर सीटों के आरक्षण की व्यवस्था” की माँग की।
- भाषायी अल्पसंख्यकों की माँग थी कि “मातृभाषा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” प्रदान की जाए तथा “भाषायी आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन किया जाए।” इसी प्रकार धार्मिक अल्पसंख्यकों का आग्रह था कि उन्हें विशेष सुरक्षाएँ प्रदान की जाएँ। विजयानगरम् के जिला शिक्षा संघ एवं बम्बई के सेंट्रल ज्यूइश बोर्ड जैसे अनेक संगठनों द्वारा “विधायिका इत्यादि सहित सभी सार्वजनिक संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व” की माँग की गई। इस प्रकार संविधान के स्वरूप निर्धारण में अनेक ऐतिहासिक ताकतों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वास्तव में, संविधान सभा को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेनेवाले लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का साधन माना जा रहा था।
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