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दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए। - History (इतिहास)

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Question

दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए।

Long Answer

Solution

दमित (दलित) समूहों की सुरक्षा के पक्ष में अनेक दावे प्रस्तुत किए गए। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय आंदोलन के काल में बी०आर० अम्बेडर ने दलित जातियों के लिए पृथक् निर्वाचिकाओं की माँग की थी। किन्तु गाँधी जी ने इसका विरोध किया था, क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसा करने से ये समुदाय सदा के लिए शेष समाज से पृथक् हो जाएँगे। दलित जात्रियों के कुछ सदस्यों का विचार था कि संरक्षण और बचाव के द्वारा ‘अस्पृश्यों’ (अछूतों) की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता था। जाति-आधारित समाज के कायदे-कानून एवं नैतिक मूल्य उनकी अपंगताओं के प्रमुख कारण थे। तथाकथित सवर्ण समाज उनकी सेवाओं एवं श्रम का तो प्रयोग करता है, किन्तु उनके साथ सामाजिक संबंध स्थापित करने से कतराता है।

मद्रास की दक्षायणी वेलायुधान ने दलितों पर थोपी गई सामाजिक अक्षमताओं को हटाने पर जोर दिया। उनके शब्दों में, “हमें सब प्रकार की सुरक्षाएँ नहीं चाहिए…. मैं यह नहीं मान सकती कि सात करोड़ हरिजनों को अल्पसंख्यक माना जा सकता है… जो हम चाहते हैं वह यह है…. हमारी सामाजिक अपंगताओं का फौरन खात्मा।” मद्रास के सदस्य जे० नागप्पा का विचार था कि दलितों की समस्याओं का मूल कारण उन्हें समाज एवं राजनीति के हाशिए पर रखा जाना था। परिणामस्वरूप वे न तो शिक्षा प्राप्त कर सके और न ही शासन में भागीदारी। स्थिति को स्पष्ट करते हुए नागप्पा ने कहा, “हम सदा कष्ट उठाते रहे हैं, किन्तु अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं हैं। हम अपनी जिम्मेदारियों को समझने लगे हैं। हमें मालूम है कि अपनी बात कैसे मनवानी है।” मध्य प्रांत के श्री के०जे० खांडेलकर ने भी लगभग इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए। सवर्ण बहुमतवाली सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “हमें हजारों वर्षों तक दबाया गया है। दबाया गया…. इस हद तक दबाया गया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करती।

और अब हमारा हृदय भी भाव-शून्य हो चुका है। न ही हम आगे बढ़ने के लायक रह गए हैं। यही हमारी स्थिति है।” विभाजन के परिणामस्वरूप होने वाली हिंसा और रक्तपात के कारण अंबेडकर ने पृथक् निर्वाचिका की माँग को छोड़ दिया था। अंत में संविधान सभा द्वारा ये सुझाव दिए गए कि (1) अस्पृश्यता को उन्मूलित कर दिया जाए; (2) हिन्दू मंदिरों के द्वार बिना किसी भेदभाव के सभी जातियों के लिए खोल दिए जाए तथा (3) विधायिकाओं एवं सरकारी नौकरियों में निचली जातियों को आरक्षण प्रदान किया जाए। लोकतांत्रिक जनता ने इन प्रावधानों का स्वागत किया। यद्यपि अधिकांश लोग इसे समस्याओं का हल नहीं समझते थे। उनका विचार था कि सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए संवैधानिक कानून पास करने के साथ-साथ समाज की सोच को परिवर्तित करना भी नितांत आवश्यक है।

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Chapter 15: संविधान का निर्माण - अभ्यास [Page 431]

APPEARS IN

NCERT History [Hindi] Class 12
Chapter 15 संविधान का निर्माण
अभ्यास | Q 6. | Page 431
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