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प्रश्न
चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों चुना गया?
उत्तर
गाँधी जी चरखे को एक आदर्श समाज के प्रतीक के रूप में देखते थे। वे प्रतिदिन अपना कुछ समय चरखा चलाने में व्यतीत करते थे। उनका विचार था कि चरखा गरीबों को पूरक आमदनी प्रदान करके उन्हें आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बना सकता है। उन्होंने 13 नवम्बर, 1924 ई० को ‘यंग इंडिया’ में लिखा था-“मेरी आपत्ति मशीन के प्रति सनक से है। यह सनक श्रम बचाने वाली मशीनरी के लिए है। ये तब तक ‘श्रम बचाते रहेंगे, जब तक कि हज़ारों लोग बिना काम के और भूख से मरने के लिए सड़कों पर न फेंक दिए जाएँ। मैं मानव समुदाय के किसी एक हिस्से के लिए नहीं अपितु सभी के लिए समय और श्रम बचना चाहता हूँ; मैं धन का केन्द्रीकरण कुछ ही लोगों के हाथों में नहीं अपितु सभी के हाथों में करना चाहता हूँ।”
गाँधी जी ने 17 मार्च, 1927 ई० को ‘यंग इंडिया’ में लिखा था-“खद्दर मशीनरी को नष्ट नहीं करना चाहता अपितु यह इसके प्रयोग को नियमित करता है और इसके विकास को नियन्त्रित करता है। यह मशीनरी का प्रयोग सर्वाधिक गरीब लोगों के लिए उनकी अपनी झोंपड़ियों में करता है। पहिया अपने-आप में ही मशीनरी का एक उत्कृष्ट नमूना है।” वास्तव में, चरखे के साथ गाँधी जी भारतीय राष्ट्रवाद की सर्वाधिक स्थायी पहचान बन गए थे। वे अन्य राष्ट्रवादियों को भी चरखा चलाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। चरखा जनसामान्य से संबंधित था और आर्थिक प्रगति का प्रतीक था, इसलिए इसे राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में चुना गया।