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निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में क्या पता चलता है? ये स्रोत सरकारी ब्योरों से किस तरह भिन्न होते हैं? - History (इतिहास)

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प्रश्न

निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में क्या पता चलता है? ये स्रोत सरकारी ब्योरों से किस तरह भिन्न होते हैं?

दीर्घउत्तर

उत्तर

निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इनसे संबंधित व्यक्ति की विचारधारा एवं उसके जीवन-चरित्र के विषय में पर्याप्त सीमा तक सही अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए गाँधी जी के पत्रों एवं उनकी आत्मकथा से गाँधी जी एवं उनकी विचारधारा को समझने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। व्यक्तिगत पत्रों से हमें संबंधित व्यक्ति के व्यक्तिगत विचारों का परिचय मिलता है। पत्रों में लेखक अपने क्रोध, पीड़ा, असंतोष, बेचैनी, आशाओं एवं हताशाओं को व्यक्त कर सकता है, किन्तु सार्वजनिक वक्तव्यों में वह ऐसा नहीं कर सकता। उल्लेखनीय है कि गाँधी जी द्वारा अपने पत्र ‘हरिजन’ में लोगों से मिलने वाले पत्रों को प्रकाशित किया जाता था।

जवाहरलाल नेहरू को राष्ट्रीय आंदोलन की अवधि में अनेक लोगों ने पत्र लिखे थे। नेहरू जी ने उन पत्रों को संकलित करके उस संकलन को ‘ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स’ (पुराने पत्रों का पुलिंदा) के नाम से प्रकाशित कराया था। इन पत्रों से पता लगता है कि 1920 के दशक में जवाहरलाल नेहरू समाजवादी विचारों से प्रभावित होने लगे थे। 1928 ई० में जब वे यूरोप से भारत वापस आए, तो उन पर समाजवाद का पर्याप्त प्रभाव था। भारत आने पर जब उन्होंने जयप्रकाश नारायण, नरेन्द्र देव और एन.जी. रंगा जैसे सुप्रसिद्ध समाजवादी नेताओं के साथ मिलकर कार्य करना प्रारम्भ किया, तो कांग्रेस में समाजवादियों एवं रूढ़िवादियों के मध्य एक खाई-सी उत्पन्न हो गई थी। 1936 ई० में कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद नेहरू फासीवाद के कट्टर विरोधी हो गए थे और वे मजदूरों एवं किसानों की माँगों का समर्थन करने लगे थे।

नेहरू के समाजवादी वक्तव्यों से कांग्रेस के रूढ़िवादी नेता इतने अधिक चिन्तित थे कि उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद और सरदार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस वर्किंग कमेटी से त्यागपत्र दे देने की भी धमकी दे दी थी। इन दोनों समाजवादी विचारों से प्रभावित युवा वर्ग और रूढ़िवादी वर्ग के मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न होने पर प्रायः गाँधी जी को मध्यस्थ का कार्य करना पड़ता था। इन पत्रों से कांग्रेस की आंतरिक कार्य-प्रणाली तथा राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप के विषय में भी महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है। इनसे स्पष्ट होता है कि वैचारिक मतभेद होते हुए भी। कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं का उद्देश्य संगठन में एकता को बनाए रखना था। उल्लेखनीय है कि व्यक्ति-विशेष को लिखे जानेवाले पत्र व्यक्तिगत होते हैं, किन्तु कुछ रूपों में वे जनता के लिए भी होते हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि प्रायः लोग व्यक्तिगत पत्रों में भी अपने विचारों को स्वतंत्रतापूर्वक व्यक्त नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें किसी भी पत्र के प्रकाशित हो जाने की आशंका बनी रहती है।

आत्मकथाओं से भी किसी व्यक्ति के जीवन तथा उसके विचारों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। जब कोई व्यक्ति अपनी जीवनकथा लिखता है, तो उसे आत्मकथा कहा जाता है। किन्तु आत्मकथाओं के अध्ययन से किसी निष्कर्ष को निकालते हुए हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि आत्मकथाओं का लेखन प्रायः स्मृति के आधार पर किया जाता है। उनसे स्पष्ट होता है कि लेखक को क्या याद रहा, वह किन चीजों को महत्त्वपूर्ण समझता था, क्या याद रखना चाहता था अथवा अपने जीवन को औरों की दृष्टि में किस प्रकार दिखाना चाहता था। आत्मकथा का लेखन एक प्रकार से अपनी तसवीर को बनाना है। लेखक को आत्मकथा के लेखन में ईमानदार रहना चाहिए, किन्तु हमें वह सब भी देखने का प्रयत्न करना चाहिए, जिसे लेखक दिखाना नहीं चाहता; हमें ऐसे विषयों में उसकी चुप्पी के कारणों को समझने का प्रयास करना चाहिए।

सरकारी ब्योरों में भिन्नता निजी पत्रों एवं आत्मकथाओं तथा सरकारी ब्योरों में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। निजी पत्रों और आत्मकथाओं में विभिन्न विचारों और घटनाओं को यथार्थ विवरण मिलता है। किन्तु सरकारी ब्योरों में विचारों एवं घटनाओं का निष्पक्ष विवरण उपलब्ध नहीं होता। हमें याद रखना चाहिए कि औपनिवेशिक शासन ऐसे तत्वों, जिन्हें वे अपने विरुद्ध समझते थे, पर सदैव कड़ी दृष्टि रखते थे। ऐसे तत्वों एवं उनकी गतिविधियों का विस्तृत उल्लेख हमें सरकारी रिपोर्टों में मिलता है। किन्तु उसे निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता। इसका प्रमुख कारण यह है कि औपनिवेशिक अधिकारी ऐसे तत्वों एवं उनकी गतिविधियों को अपने दृष्टिकोण से देखते थे। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत पुलिसकर्मियों एवं अन्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए पत्रों एवं रिपोर्टों को गोपनीय रखा जाता था। उल्लेखनीय है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों से गृह-विभाग द्वारा पाक्षिक रिपोर्टे (हर पंद्रह दिन अथवा हर पखवाड़े में तैयार की जानेवाली रिपोर्ट) तैयार की जाने लगी थीं।

इन रिपोर्टों को स्थानीय क्षेत्रों से पुलिस से प्राप्त होनेवाली सूचनाओं के आधार पर तैयार किया जाता था। इन रिपोर्टों से यह भी स्पष्ट होता है कि समकालीन औपनिवेशिक अधिकारी किसी परिस्थिति विशेष को किस प्रकार देखते और समझते थे। राजद्रोह एवं विद्रोह की संभावना स्वीकार करते हुए भी वे इन आशंकाओं को आधारहीन बताकर स्वयं को आश्वस्त करना चाहते थे। नमक सत्याग्रह के काल की पाक्षिक रिपोर्टों का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि गृह-विभाग यह स्वीकार करने को कदापि तैयार नहीं था कि महात्मा गाँधी की गतिविधियों को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हो रहा था। उदाहरण के लिए, पुलिस की पाक्षिक रिपोर्टों में नमक यात्रा का चित्रण एक ऐसे नाटक एवं करतब के रूप में किया जा रहा था, जिसका प्रयोग ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ऐसे लोगों को गोलबंद करने के लिए किया जा रहा था, जो वास्तव में इस शासन के विरुद्ध आवाज उठाने के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि वे इस शासन के अंतर्गत सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे। पुलिस की पाक्षिक रिपोर्टों के अनुसार यह भारतीय नेताओं को एक हताश प्रयास था।

इस प्रकार, सरकारी ब्योरों के प्रत्येक विवरण को यथार्थ घटनाक्रम का वास्तविक उल्लेख नहीं माना जा सकता। वास्तव में, इन विवरणों से ऐसे अफसरों की आशंकाओं एवं बेचैनियों का परिचय मिलता है, जो किसी आंदोलन को नियंत्रित कर पाने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे थे तथा जो उसके प्रसार को लेकर अत्यधिक चिंतित थे। वे यह निर्णय लेने में असमर्थ थे कि गाँधी जी को बंदी बनाया जाना चाहिए अथवा नहीं। वे यह भी नहीं समझ पा रहे थे कि गाँधी जी को बंदी बनाए जाने का परिणाम क्या होगा। इस प्रकार निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि निजी पत्रों और आत्मकथाओं के विवरण
सरकारी ब्योरों के विवरणों से अनेक रूपों में भिन्न होते हैं।

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गाँधी को समझना
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अध्याय 13: महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन - अभ्यास [पृष्ठ ३७५]

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एनसीईआरटी History [Hindi] Class 12
अध्याय 13 महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन
अभ्यास | Q 9. | पृष्ठ ३७५
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