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प्रश्न
क्या चिंतन भाषा के बिना होता है? परिचर्चा कीजिए।
उत्तर
चिंतन की विभिन प्रकार की प्रक्रियाओं के विषय में आप सभी जानते हैं। हम सोचते हैं उसकी अभिव्यक्ति के लिए शब्द या भाषा आवश्यक है। यह खंड भाषा एवं विचार के मध्य संबंध की परीक्षा करता है। भाषा विचार को निर्धारित करती है और विचार भाषा को तथा भाषा एवं विचार के उद्गम भिन्न- भिन्न है।
विचार के निर्धारक के रूप में भाषा :
हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में बंधुत्व संबंधों के लिए हम विभिन्न प्रकार के अनेक शब्दों का उपयोग करते हैं। माता के भाई, पिता के बड़े भाई, पिता के छोटे भाई, माता की बहन के पति, पिता की बहन के पति आदि के लिए हमारे पास अलग-अलग शब्द हैं। एक अंग्रेज इन सभी बंधत्व संबंधों के लिए मात्र एक शब्द 'अंकल' (अर्थात् चाचा) का उपयोग करता है। अंग्रेजी भाषा के रंगों के लिए अनेक शब्द हैं जबकि कुछ जनजातीय भाषाओं में केवल दो से चार रंगों के नाम हैं। क्या ऐसी भिन्नताएँ हमारे सोचने या चिन्तन करने के तरीके के लिए महत्त्व रखती हैं ? क्या एक भारतीय बच्चे के लिए रिश्ते-नातों में विभेद करना अपने अंग्रेजी भाषा प्रतिपक्षी की तुलना में सरल है ? क्या हमारी चिन्तन प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि हम उसका वर्णन भाषा में किस प्रकार करते हैं ? सच तो यह है कि चिंतन भाषा के बिना नहीं होता है।