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वियोगावस्था में सुख देने वाली वस्तुएँ भी दुख देने लगती हैं। 'गीतावली' से संकलित पदों के आधार पर सिद्ध कीजिए। - Hindi (Elective)

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प्रश्न

वियोगावस्था में सुख देने वाली वस्तुएँ भी दुख देने लगती हैं। 'गीतावली' से संकलित पदों के आधार पर सिद्ध कीजिए।

टीपा लिहा

उत्तर

सुखकाल में सुखदायी प्रतीत होने वाली वस्तुएँ भी वियोगावस्था में दुख का कारण बन जाती हैं। इसका कारण यह है कि हम उन चीजों को देखकर उनसे जुड़ी सुखद स्मृतियों में खो जाते हैं। उनसे जुड़े व्यक्तियों का स्मरण हो जाता है। यह बात शृंगार तथा वात्सल्य दोनों अवस्थाओं में उत्पन्न होती है। माता कौशल्या भी अपने पुत्र राम से संबंधित वस्तुओं को देखकर भाव विह्वल हो जाती हैं। वह राम के शीघ्र लौटने की कामना करने लगती हैं।

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भरत-राम का प्रेम
  या प्रश्नात किंवा उत्तरात काही त्रुटी आहे का?
2021-2022 (April) Term 2 Sample

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पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े।

नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥

कहब मोर मुनिनाथ निबाहा।

एहि ते अधिक कहौं मैं काहा॥


निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा॥
बिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ ऐहि घाएँ॥
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू॥
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई॥
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तापस तीछी॥


निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए -

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥
मो पर कृपा सनेहू बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी॥

भरत का आत्म परिताप उनके व्यक्तित्व के किस पक्ष की ओर संकेत करता है? वर्तमान में ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता सिद्ध कीजिए।


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