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Question
आशय स्पष्ट कीजिए -
जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिलपित भेल॥
सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल॥
Short Note
Solution
इन पंक्तियों में विद्यापति प्रेम में अतृप्ति के बारे में बताते हैं। सखी द्वारा प्रेम का अनुभव पूछने पर नायिका सखी को बताती है- मैं जन्म-जन्मांतर से अपने प्रियतम का रूप निहारती चली आ रही हूँ परंतु अभी भी मेरे नेत्र तृप्त नहीं हुए हैं। प्रियतम के मधुर बोल मेरे कानों में गूँजते रहते हैं फिर भी ऐसा लगता है कि मैंने उन्हें कभी सुना ही न हो। रूप और वाणी की चिर नवीनता मुझे अतृप्त बनाए रखती है। निष्कर्ष यह है कि सच्चे प्रेम में अतृप्ति बनी रहती है।
shaalaa.com
विद्यापति
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