Advertisements
Advertisements
Question
‘सहयोग से कठिन कार्य की पूर्ति होती है’ विषय पर अपने विचार शब्दांकित कीजिए।
Solution
यह कहावत एक महत्वपूर्ण सत्य को उजागर करती है और साबित करती है कि जब लोग साथ मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी कठिनाई पार की जा सकती है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सहयोग की आवश्यकता होती है। कठिन कार्यों में सहयोग का महत्व बढ़ जाता है क्योंकि ऐसे कार्यों में केवल एक व्यक्ति के लिए अकेले ही सभी कठिनाइयों का सामना करना आसान नहीं होता है। प्राकृतिक आपदा के समय सहयोग के कारण ही लोग बड़े साहसिक कार्य कर जाते है। इसके अलावा, सहयोग से समृद्धि होती है क्योंकि यह लोगों को एक दूसरे के साथ जोड़ता है और उन्हें सामूहिक उत्साह में भागीदार बनाता है। समृद्धि, उन्नति, और संपूर्णता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए लोगों को एक दूसरे के साथ काम करना चाहिए। सहयोग की प्रक्रिया व्यक्ति के जीवन के हर चरण में मौजूद होती है। समाज की प्रगति सहयोग और परस्पर निर्भरता से गतिवान होती है। समाज की आवश्यकता के अनुसार इसका स्वरूप बदलता रहता है। आज व्यक्ति आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में सहयोग के माध्यम से अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करता है। सांसारिक उन्नति और सुखपूर्वक जीवन बिताने के लिए सहयोग की आवश्यकता सभी स्वीकार करते हैं। जिन व्यक्तियों में सहयोग की वृत्ति का विकास हो जाता है, उनमें वसुधैव कुटुंबकम की भावना भी जाग जाती है। वे अनुभव करने लगते हैं कि संसार में जितने प्राणी हैं, वे वास्तव में एक ही विशाल परिवार के अंग हैं। इस प्रकार, "सहयोग से कठिन कार्य की पूर्ति होती है" जब लोग एक साथ काम करते हैं, तो एक महत्वपूर्ण विचार को स्थापित करता है।
APPEARS IN
RELATED QUESTIONS
निम्नलिखित पठित गदयांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
'एक बार एक बहुरूपिये ने साधु का रूप बनाया - सिर पर जटाएँ, नंगे शरीर पर भस्म, माथे पर त्रिपुंड, कमर में लँगोटी। उसके रूप में कहीं कोई कसर नहीं थी और यह संसारत्यागी साधु ही लगता था। उसने नगर से बाहर बड़े-से पेड़ के नीचे अपनी झोंपड़ी तैयार की, बगीचा लगाया और बैठकर तपस्या करने लगा। थीरे-धीरे सारे नगर में यह/समाचार फैलने लगा कि बाहर एक बहुत पहुँचे हुए महात्मा ने आकर डेरा लगाया है। लोग उसके दर्शनों को आने लगे और धीरे-धीरे चारों तरफ साधु का यश फैल गया। सारें दिन उसके यहाँ भीड़ लगी रहती थी। लोग कहते थे कि महात्मा जी के उपदेशों में जादू है और उनके आशीर्वाद से संसार के बड़े से बड़े कष्ट दूर हो जाते हैं। अपनी इस कीर्ति से साधु को कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता और मन-ही-मन वह अपनी सफलता पर मुसकराया करता। |
उत्तर लिखिए:
(1) बहुरूपिये का साधु रूप ऐसा था: (2)
- माथे पर ______
- सिर पर ______
- नंगे शरीर पर ______
- कमर में ______
(2) (i) निम्नलिखित शब्दों के विलोमार्थक शब्द गद्यांश में से ढूँढ़कर लिखिए: (1)
- महल × ______
- असफलता × ______
(ii) निम्नलिखित शब्दों के वचन बदलकर लिखिए: (1)
- डेरा - ______
- लँगोटी - ______
(3) 'हमें अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदार होना चाहिए' 25 से 30 शब्दों में अपने विचार लिखिए। (2)
निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
बहुरूपियों के बारे में हम सब जानते हैं। इन लोगों का पेशा अब समाप्त होता जा रहा है। किसी समय रईसों और अमीरों का मनोरंजन करने वाले बहुरूपिये प्राय: हर नगर में पाए जाते थे। ये कभी धोबी का रूप लेकर आते थे, कभी डाकिए का। हू-बू-हू उसी तरह का व्यवहार करके ये प्राय: लोगों को भ्रम में डाल देते थे। इनकी इसी सफलता से धोखा खा जाने वाला रईस इन्हें इनाम देता था। उसी तरह के बहुरूपिये का एक रूप मैंने राजस्थानी लोककथाओं में सुना था और मुझे वह अभी भी अच्छी तरह याद है। |
(1) एक अथवा दो शब्दों में उत्तर लिखिए:
(क) बहुरूपिये प्राय: यहाँ पाए जाते थे - ______
(ख) बहुरूपिये इनका मनोरंजन करते थे - ______
(ग) बहुरूपिये इनका रूप लेते थे - ______
(घ) ये लोगों को प्राय: भ्रम में डालते थे - ______
(2) (च) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द ढूँढ़कर लिखिए:
- गरीब
- बुरी
(छ) निम्नलिखित शब्दों के वचन परिवर्तन करके लिखिए:
- बहुरूपिया
- लोककथाएँ
(3) “व्यक्तित्व विकास में कला का महत्व" अपने विचार लिखिए।
निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए-
एक दिन साधु ने देखा कि घोड़ों-ऊँटों और बैलगाड़ियों का झुंड उसकी कुटी की तरफ चलता आ रहा है। मन में संदेह हुआ कि लोगों को उसकी असलियत का पता तो नहीं चल गया और ये सरकार के आदमी उसे पकड़ने चले आ रहे हैं। वह अभी यही सब सोच ही रहा था कि देखा, उस झुंड के आगे-आगे वही सेठ है। सेठ पास आया। उसने साधु को प्रणाम किया। गाड़ियों, घोड़ों, ऊँटों से, सोने-चाँदी के गहनों, मुहरों और जवाहरातों से भरे कलसे उतारे गए। देखते-देखते कुटी के सामने ढेर लग गया। सेठ ने साधु के चरण पकड़कर कहा- “महाराज, आपके उपदेशों से मुझे सच्चा ज्ञान प्राप्त हो गया है और इस संसार से मन फिर गया है। झूठ-कपट से मैंने जो धन कमाया है, वह सब मैं आपके चरणों में रख रहा हूँ। |
(1) संजाल पूर्ण कीजिए- (2)
(2) (i) गद्यांश में प्रयुक्त शब्द युग्म की जोड़ी लिखिए। (1)
(ii) गद्यांश में प्रस्तुत विलोम शब्द की जोड़ी लिखिए: (1)
______ × ______
(3) साधु-सन्तों के स्वभाव के बारे में अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए। (2)
संजाल पूर्ण कीजिए:
परिणाम लिखिए:
बीमार सेठानी पर धूनी की चुटकी भर राख का -
परिणाम लिखिए:
बहुरूपिये की वास्तविकता जानने के उपरांत सेठ जी की स्थिति -
निम्नलिखित विधान सही करके लिखिए:
बहुरूपिये हू-बू-हू उसी तरह का व्यवहार करके प्रायः लोगों को भ्रम में नहीं डालते थे।
निम्नलिखित विधान सही करके लिखिए:
एक बार सेठ जी बीमार हो गए।
निम्नलिखित विधान सही करके लिखिए:
सेठानी कभी-कभी आने लगी।
निम्नलिखित विधान सही करके लिखिए:
साधु ने झगड़ा करके सेठ को लौटा दिया।
प्रवाह तालिका पूर्ण कीजिए:
निम्नलिखित वाक्यों को घटनाक्रम के अनुसार लिखिए:
- सेठ जी द्वारा सेठानी को साधु के पास ले जाना।
- बहुरूपिये का साधु का रूप लेना।
- सेठानी का बीमार होना।
- धीरे-धीरे सेठानी की तबियत सुधरना।
‘कला के प्रति ईमानदारी ही सच्चे कलाकार की पहचान है।’ इस सुवचन पर अपने विचार लिखिए।