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Question
सूरदास कहाँ तो नैराश्य, ग्लानि, चिंता और क्षोभ के अपार जल में गोते खा रहा था, कहाँ यह चेतावनी सुनते ही उसे ऐसा मालूम हुआ किसी ने उसका हाथ पकड़कर किनारे पर खड़ा कर दिया।
नकारात्मक मानवीय पहलुओं पर अकेले सूरदास का व्यक्तित्व भारी पड़ गया। जीवन मूल्यों की दृष्टि से इस कथन पर विचार कीजिए।
Solution
सूरदास एक अंधा भिखारी था। वह लोगों के दान पर ही जीता था। संपत्ति में एक झोपड़ी, जमीन का छोटा-सा टुकड़ा और जीवनभर जमा की गई पूँजी थी। एक अंधे भिखारी के पास इतना धन होना लोगों के लिए हैरानी की बात हो सकती थी। अर्थात इस नकारत्मकता के साथ कि लोग उसके धन को देखकर उसकी कहीं बेज्जती न करने लगे इसलिए उसने उसे गुप्त रखा था। झोपड़ी के साथ ही पूँजी के जल जाने से अब उसकी कोई भी अभिलाषा पूरी नहीं हो सकती थी। उसके लिए यह फूस की राख नहीं है बल्कि उसकी अभिलाषाओं की राख है। लेकिन फिर भी वह सब कुछ दुबारा से शुरू करने को तैयार हो जाता है।
- हार न मानने की प्रवृत्ति: सूरदास जीवन की विषम तथा प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हार नहीं मानता।
- पुनः परिश्रम निर्णय लेने की क्षमता: सूरदास, किसी भी परिस्थिति को केवल मौन रहकर उसे स्वयं पर हावी नहीं होने देता। वह तुरंत सकारात्मक निर्णय लेकर जीवन में आगे बढ़ता है। झोपड़ी जलने पर उसने यही किया।
- सहृदय एवं परोपकारी: सुरदास कोमल हृदय का है जिसने स्वयं पर संकट आने का संदेशा होने पर भी सुभागी को शरण दी। अंत में भी सुभागी के बेघर होने की जिम्मेदार वह स्वयं को ही मानता है।
- आशावादी दृष्टिकोण: मिठुआ के खेल की बात सुन कर सूरदास के मन में भविष्य के प्रति नवीन आशा जागृत होती है।वह अतीत को भूल कर भविष्य को फिर से सुधारना चाहता है।
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