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प्रश्न
जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताएँ।
उत्तर
- जाति खंडीय विभाजन पर आधारित है – जाति एक संस्था है। और यह खंडीय विभाजन पर आधारित है। इसका तात्पर्य यह है कि जातीय समाज कई बंद और पारस्परिक खंडों एवं उपखंडों में विभाजित है।
- जाति सोपानिक विभाजन पर आधारित हैं – जातिगत समाज का आधार सोपानिक विभाजन है। दूसरी जाति की तुलना में प्रत्येक जाति असमान होती है।
- जाति सामाजिक अंतक्रिया पर प्रतिबंध लगाती है – संस्था के रूप में जाति सामाजिक अंत:क्रिया पर प्रतिबंध लगाती है विशेषकर साथ बैठकर भोजन करने के संदर्भ में।
- अस्पृश्यता की संस्था के रूप में – अस्पृश्यता की संस्था के रूप में यहाँ तक किसी जाति विशेष के व्यक्ति द्वारा छू जाने मात्र से मनुष्य अपवित्र महसूस करता है।
- विभिन्न जातियों के लिए भिन्न-भिन्न अधि कार और कर्तव्य – सोपानिक और प्रतिबंधित सामाजिक अंत:क्रिया के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए जाति विभिन्न जातियों के लिए भिन्न-भिन्न अधिकार और कर्तव्य भी निर्धारित करती है।
- व्यवसाय के चुनाव पर प्रतिबंध जाति व्यवसाय के चुनाव को भी सीमित कर देती है – जाति के समान व्यवसाय भी जन्म पर आधारित और वंशानुगत होता है।
- जाति विवाह पर कठोर प्रतिबंध लगाती है – जाति विवाह पर कठोर प्रतिबंध लगाती है। जाति में अंतर्विवाह या जाति में ही विवाह के अतिरिक्त ‘बहिर्विवाह’ के नियम भी जुड़े रहते हैं, या किसकी शादी किससे नहीं हो सकती है।
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