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प्रश्न
निम्नलिखित अपठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए: [4]
परोपकार ही मानवता है, जैसा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है - ‘वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे।’ केवल अपने दुख-सुख की चिंता करना मानवता नहीं, पशुता है। परोपकार ही मानव को पशुता से सदय बनाता है। वस्तुतः निस्स्वार्थ भावना से दूसरों का हित साधन ही परोपकार है। मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार परोपकार कर सकता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति करना ही परोपकार है और सहानुभूति किसी भी रूप में प्रकट की जा सकती है। किसी निर्धन की आर्थिक सहायता करना अथवा किसी असहाय की रक्षा करना परोपकार के रूप हैं। किसी पागल अथवा रोगी की सेवा-शुश्रूषा करना अथवा किसी भूखे को अन्नदान करना भी परोपकार है। किसी को संकट से बचा लेना, किसी को कुमार्ग से हटा देना, किसी दुखी-निराश को सांत्वना देना-ये सब परोपकार के ही रूप हैं। कोई भी कार्य, जिससे किसी को लाभ पहुँचता है, परोपकार है, जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न रूपों में किया जा सकता है। |
- कोष्ठक में दिए गए शब्दों में से चुनकर तालिका पूर्ण कीजिए:
(सांत्वना, पशुता, सेवा-शुश्रूषा, मानवता, सामर्थ्य)
(1) परोपकार ही ______ (2) केवल अपने सुख-दुख की चिंता करना ______ (3) पागल अथवा रोगी की ______ (4) दुखी-निराश को ______ - 'मानवता ही सच्चा धर्म है' विषय पर 25 से 30 शब्दों में अपने विचार लिखिए।
आकलन
उत्तर
(1) परोपकार ही मानवता (2) केवल अपने सुख-दुख की चिंता करना पशुता (3) पागल अथवा रोगी की सेवा-शुश्रूषा (4) दुखी-निराश को सांत्वना - मानवता सच्चा धर्म है क्योंकि यह व्यक्ति को दूसरों की सहायता करने, प्रेम और दया दिखाने की सीख देती है। बिना भेदभाव के जरूरतमंदों की मदद करना, परोपकार करना, और दुखियों को सांत्वना देना ही मानवता की पहचान है। अगर हर व्यक्ति मानवता के इस मार्ग पर चले, तो समाज में प्रेम, शांति और सौहार्द बना रहेगा। इसलिए, मानवता को ही सच्चा धर्म मानना चाहिए।
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या प्रश्नात किंवा उत्तरात काही त्रुटी आहे का?